اے حُسن تیرے نام سے ہے پیار کسی کو
ہونے لگی ہے حسرتِ دیدارِ کسی کو
ऐ हुस्न तेरे नाम  से है प्यार किसी को
होने लगी है हसरते दीदार किसी को
قاتل ادا کا در تھا فقط میرا رہگزر
اللہ نہ دے آنکھ میں تلوار کسی کو
क़ातिल अदा का दर था फ़क़त मेरा रहगुज़र
अल्लाह न   दे आँख   में   तलवार किसी  को
گر راز رہے راز تو پھر راز کی خاطر
بیساختہ نہ راہ میں پکار کسی کو
गर राज़ रहे राज़ तो उस राज़ की खातिर
बेशाख्ता न राह  में   पुकार   किसी   को
وعدے میں تھی خلوص پر ہمت کی رہی بات
کرنا پڑا جو وقت پر انکار کسی کو
वादे में थी खुलूस पर हिम्मत की रही बात
करना पड़ा जो वक़्त पर इंकार किसी को
الزام تو ہے سچ پر مجرم نہیں تہا بندہ
تونے ہی بنایا تھا گنہگار کسی کو
इल्ज़ाम तो है सच पर मुज़रिम नहीं था बन्दा
तूने    ही  बनाया   था  गुनहगार  किसी  को
نظرا نۓ اُلفت میں تو جان فدا کردي
کہتے رہیں اب وقت کا وہ يار کسی کو
नज़रानए उलफत में तो जान फ़िदा कर दी
कहते रहें अब  वक़्त का  वह यार किसी को
ہم بےگناہ ھوتے تو راز ہی رہ جاتا
کہتے نہیں ہے واعظ غفار کسی کو
हम बे गुनाह होते तू  राज़  ही रह जाता
कहते नहीं ये वाइज़ ग़फ़्फ़ार किसी को
ناصح تو ہی بتا کہ آخر علاج کیا ہے
جب چاہنے لگا ہو سنسار کسی کو
नासेह तू ही बता की आखिर इलाज क्या है?
जब  चाहने  लगा   हो   संसार  किसी   को
اس غرض کی دنیا میں بستے ہیں بے غرض بھی
اپنا بنا کر دیکھ لے اک بار کسی کو
इस ग़र्ज़ की दुनिया में बस्ते हैं बे ग़रज़ भी
अपना बना कर देख ले एक बार किसी को
بچتا رہا بچتے گیا بچنا بھی تھا کمال
بخشے نہیں ہیں آج تک سرکار کسی کو
बचता रहा बचते गया बचना भी था कमाल
बख्शे नहीं हैं आज तक सरकार किसी को
دوستی کے واسطے ہے دشمنی بھی شرط
لانا پڑا تھا بر سرے پیکار کسی کو
दोस्ती   के   वास्ते है दुश्मनी भी   शर्त
लाना पड़ा था बरसरे पैकार किसी को
تیری عاشقی میں پڑ کر دانا بنے تھے ماہر
یہاں مانتا کون ہے ہنشيار کسی کو
तेरी आशकी में पड़ कर दाना बने थे माहिर
यहां मानता कौन   है हुँशियार   किसी   को
جدا تم سے ہونے کو جی چاہتا ہے
ویرانے میں رونے کو جی چاہتا ہے
जुदा तुम से होने को जी चाहता है
वीराने  में  रोने  को  जी चाहता है
شب کو جو محفل سے مجھ کو نکالا
اسی کا اب ہونے کو جی چاہتا ہے
शब् को जो मेहफिल से मुझ को निकला
उसी  का  अब  होने  को  जी  चाह्ता  है
عمر کاٹ ڈالی ہے تاریکیوں میں
ایک شمع جلانے کو جي چاہتا ہے
उम्र  काट  डाली है  तरीकियों में
एक शमा जलाने को जी चाहता है
گھٹاؤں میں رنگت فضاؤں میں مستی
اُنہیں آزمانے کو جی چاہتا ہے
घटाओं में रंगत फ़िज़ाओं में मस्ती
उन्हें आज़माने  को  जी  चाहता है
حسینوں کی محفل میں چرچا ہوا تھا
اُنہیں اب بلانے کو جی چاہتا ہے
हसीनों की मेहफ़िल में चर्चा हुआ था
उन्हें अब  बुलाने  को  जी  चाहता  है
اشاروں کو سمجھا بہت دور آ کر
اب پھر لوٹ جانے کو جی چاہتا ہے
इशारों  को  समझा बहुत  दूर आकर
अब फिर लौट जाने को जी चाहता है
تیری بے رخی میں ہے تسکین میری
تُجھے اب ستانے کو جی چاہتا ہے
तेरी  बेरुखी  मे है  तस्कीन  मेरी
तुझे अब सताने को जी चाहता है
تیری سادگی میں محبت کے موتی
گلے سے لگانے کو جی چاہتا ہے
तेरी सादगी में मोहब्बत के मोती
गले से  लगाने को जी  चाहता  है
شریکِ حیات آب پرانے ہوۓ ہیں
نیا گھر بسانے کو جی چاہتا ہے
शरीके हेयात अब  पुराने  हुए हैं
नया घर बसाने को जी चाहता है
ماہر بھی کرتے ھیں بے وقت کوشش
اُنہیں اب منانے کو جی چاہتا ہے
माहिर भी करते हैं बेवक़्त कोशिश
उनहें अब मानाने को जी चाहता है
ہمت کیا تھا حُسن نے اظہار کی حد تک
قِسمت میری پلٹی بھی تو دیدار کی حد تک
हिम्मत किया था  हुस्न ने इज़हार की  हद तक
क़िस्मत मेरी पलटी भी तो दीदार की हद तक
قِسمت کے پیچ و خم نے کھیلیں ہیں مجھ سے کھیل
پیار کا رشتہِ چلا ہے پیار کی حد تک
क़िस्मत के पेच व ख़म ने खेलें हैं मुझ से खेल
प्यार का  रिश्ता  चला  है प्यार  की  हद तक
پائے نگاہِ یار سے جب قتل کی دعوت
بڑھتے رہے دیوانے سب تلوار کی حد تک
पाए निगाहे यार से जब क़त्ल की दावत
बढ़ते  रहे  दीवाने  सब तलवार  की हद
آہ کا چلتا نہیں دل کی تپش کے سامنے
اشک بھی جل جاتے ہیں رخسار کی حد تک
आह का चलता नहीं दिल की तपिश के सामने
अश्क भी  जल जाते  हैं रुखसार  की हद तक
اُمید پہ ہے دنیا کوشش کئے ھوں پیہم
شاید وہ مان جائیں اسرار کی حد تک
उम्मीद पे है दुनिया कोशिश किये हूँ पैहम
शायद वह मान जाएँ इसरार की  हद तक
اہل وفا نے رسمِ وفا چھوڑ دیئے آج
جانے لگا ہے حُسن بھی خریدار کے حد تک
अहले वफ़ा ने रस्मे वफ़ा  छोड़ दिए आज
जाने लगा है हुस्न भी खरीदार की हद तक
مختصر سی زندگی اور عشق اُنسے امتحان
کاش وہ آتے کبھی اقرار کی حد تک
मुख़्तसर सी ज़िन्दगी और इश्क़ उनसे इम्तहान
काश  वह  आते  कभी   इक़रार  की  हद  तक
اس بے وطن کی لاش کو مل جائےگا کفن
جِس نے بنائے دوست ہوں اغیار کی حد تک
उस बेवतन की लाश को मिल जायेगा कफ़न
जिसने बनाया दोस्त हो अग़यार की हद तक
ہو غرض ہی منزل تو پھر اختلاف کیسا
خود غرض نہ جاتے ہیں تکرار کی حد تک
हो गरज़ ही मंज़िल तो फिर इख़तेलाफ़ कैसा
ख़ुदग़र्ज़  न  जाते  हैं  तकरार  की  हद  तक
غیرت گئی جہاں سے ماہر نے کی فریاد
سودا کیے ہیں آپ نے بازار کی حد تک
ग़ैरत  गई  जहाँ से  माहिर  ने की फर्याद
सौदा किये हैं आपने बाजार की हद तक
اجل بنیاد رکھا تھا بقاء کی صرف اُلفت پر
دھرم مذہب یہ ذات و پات کس نے لا کھڑا کر دی
अज़ल  बुनियाद रखा था  बक़ा की सिर्फ उल्फत पर
धरम मज़हब यह जातोपात किस ने ला खड़ा कर दी
خُدا نے مرد عورت میں فقط اِنسان کو بانٹا
بنامے دھرم واعظ نے اصولِ حق فنا کر دی
खुदा ने मर्द औरत में फ़क़त इंसान को बाँटा
बनमे धर्म वाईज़ ने वसुले हक़ फिना कर दी
چھپے تھے دھرم کی چادر میں ہم رہزن جہاں والے
کسی کمضرف شاعر نے حقیقت ہی بیان کر دی
छुपे थे  धर्म  की चादर  में  हम  रहज़न  जहाँ  वाले
किसी कमज़र्फ शायर ने हकीकत ही बयान कर दी
نہ آنا تھا نہیں آتے تمنّا تھی رہائی کی
مریض غم رہا ہوتا تو آکر کیا بھلا کردی
न  आना  था   नहीं  आते  तमन्ना  थी  रिहाई  की
मरीज़े ग़म रिहा होता तू आकर क्या भला कर दी
سیاست کے سمندر میں کوئی منزل نہیں ہوتی
ہوا کے رُخ کو دیکھا اور کشتی کو رواں کر دی
सियासत  के  समुन्दर  में कोई  मंज़िल नहीं होती
हवा के रुख को देखा और किश्ती को रवाँ कर दी
نہ بن هنشیار ا ے ماہر لحد تیار رکھ اپنی
حقیقت میں حقیقت جو حقیقت کی عیاں کر دی
न बन  हुंशियार  ऐ माहिर  लेहद तैयार रख अपनी
हकीकत में हक़ीक़त जो हक़ीक़त की बयां कर दी
دنیا سے انجان رہے تم
جیتے جی بےجان رہے تم
بن بلائے آتا کیسے
اپنے سے حیران رہے تم
दुन्या से अनजान रहे तुम
जीते जी  बेजान  रहे तुम
बिन  बुलाये  आता  कैसे
अपने से  हैरान रहे  तुम
نہ کوئی رغبت نہ کوئی چاہت
اوپر سے سنسان رہے تم
جب پردیشی دیش کو لوٹا
آخر کیوں پریشان رہے تم
न कोई रग़बत न कोई  चाहत
ऊपर  से  सुनसान   रहे   तुम
जब  परदेशी  देश  को   लौटा
आखिर क्यों  परीशान रहे तुम
روپ کی رانی مست جوانی
غزلوں میں طوفان رہے تم
تم بن یہ سنسار نہ ہوتا
دنیا کی پہچان۔ رہے تم
रूप की  रानी मस्त जवानी
ग़ज़लों में तूफ़ान   रहे  तुम
तुम बिन यह संसार न होता
दुनिया की पहचान रहे तुम
تو نہ مانے بات الگ ہے
اپنوں کے ارمان رہے تم
تیری خاطر جان تو دیدی
دُشمن کے مہمان رہے تم
तू न  माने  बात  अलग  है
अपनों के अरमान रहे तुम
तेरी ख़ातिर जान तो दे दी
दुश्मन के मेहमान रहे तुम
جس کرنی تس بھوگ رے دا تا
نرک جات کیوں پچھتاتا
जस करनी तस भोग रे दाता
नरक जात क्यों पछताता
خاموش ہو کے سن لئے اِلزام اُسکے سب
کہ بھی نہ پائی اُس سے میرا عتبار کر
उसे न याद करने की क़सम खाता तो हूं मोहसिन
टपक पड़ते हैं फिर आंसू क़सम फिर टूट जाती है
اے طبیب یوں کوشش نہ کر تُجھے کیا خبر میرے مرض کی
پہلے عشق کر پھر چھوٹ کہا پھر لکھ دوا میرے مرض کی
Nazar ka teer jigar men rahe to achchha hai
Yah ghar ki baat hai Ghar men rahe to achchha hai
مُدّتوں بعد، مَیں مسجد میں آیا تھا
میرا جوتا وہیں کھویا جہاں سے اُسے اٹھایا تھا
मुद्दतों बाद ,मैं मस्जिद में आया था
मेरा जुता वहीँ खोया जहाँ से उसे उठाया था
غالب آور اقبال وفا پر
اڑنے دے ان پرندوں کو آزاد فضاؤں میں غالب
جو تیرے اپنے ہونگے وہ لوٹ آئینگے کسی روز
نہ رکھ اُمید وفا کی کسی پرندے سے اقبال
جب پر نکل آتے ہیں تو اپنا ہی آشیانہ بھول جاتے ہیں
اپنوں نے مجھے مارا غیروں میں کہاں دم تھا
کشتی میری ڈوبی جہاں پانی کم تھا
باغِ بہشت سے مجھے حکم سفر دیا تھا کیوں
کار جہاں دراز ہے تو میرا انتظار کر
खोल दे बाबे मयकदा शाकी
एक फरिश्ता भी तेरे इंतजार में है
अजीज इतना ही रखो कि दिल बहल जाय
किसी को इतना न चाहो कि दम निकल जाय
डूब गए हैं लोग सभी हैरानी में
जाने क्या कह दी है बात रवानी में
मुझको चुप रहने की आदत है वरन
जानता हूं कौन है कितना पानी में
तू जिनसे मुहब्बत है क़िमात है ग्राँ तेरी
कम माया हैं सौदागर इस देश में सस्ता हो
بدلا جو وقت گہری رفاقت بدل گئی
سورج دھلا تو سائے کی صورت بدل گئی
اِک عُمر تک میں اُسکی ضرورت بنا رہا
پھر یوں ہوا کہ اُسکی ضرورت بدل گئی
محبّت میں ذرا سی بیوفائی بھی ضروری ہے
وہی اچّھا بھی لگتا ہے جو وعدہ توڑ دیتا ہے
وفاؤں کے تسلسل سے محبت روٹھ جاتی ہے
کہانی میں ذرا سی بیوفائی مانگتے رہنا
यह चमन यूँ ही रहेगा और हज़रों बुलबुलें
अपनी अपनी बोलियां सब बोलकर उड़ जाएँगी
تیشہ بيغیر مر نہ سکا کوہ کن اسد
سرِ گستہ خُمار رسوم و قیود تھا
چال تو اچّھی ہے پر حال برا ہے
وہ دن ہوا ہوئے کہ پسینہ گلاب تھا
زِندگی ہر آدمی کی کُچھ دِنوں کا کھیل ہے
وہ دِیا اُتنا جلیگا جِس میں جتنا تیل ہے
ایک تیرا ہی خیال آتا ہے
جب بات چلتی ہے محبّت کے
قربان تیری گلیوں پر اے وطن کہ جہاں
چلی ہے رسم کہ نہ کوئی سر جھکا کے چلے
بھری دُنیا میں جی نہیں لگتا
جانے کِس چیز کی کمی ہے ابھی
وقت اچّھا بھی آئیگا ناصر
غم نہ کر زِندگی پڑی ہے ابھی
زہے نصیب کہ شود دُشمن ہلاک تیغت
سرِ دوستاں مُبارک کہ تُو خنجر آزمائی
अजीज इतना ही रखो कि दिल बहल जाय
किसी को इतना न चाहो कि दम निकल जाय
قربان تیری گلیوں پہ اے وطن کہ جہاں
چلی ہے رسم کہ نہ کوئی سر اُٹھا کے چلے
अजीज इतना ही रखो कि दिल बहल जाय
किसी को इतना न चाहो कि दम निकल जाय
دیارِ عشق میں اپنا وقار پیدا کر
نیا زمانہ نئی صبح شام پیدا کر
दयार ए इश्क़ में अपना मकाम पैदा कर
नया    ज़माना   नई सुब्ह   शाम पैदा कर........इक़बाल
خودی کو کر بلند اتنا کہ ہر تقدیر سے پہلے
خُدا بندے سے خود پوچھے بتا تیری رضا کیا ہے
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा    बन्दे से    ख़ुद पूछे   बता   तेरी रेज़ा क्या है....इक़बाल
یہ حجابات نظر کچھ نہیں اے دوست میرے
میں نے تجھ کو تیری آواز سے پہچان لیا
ये हेजाबाते  नज़र  कुछ  नहीं ऐ दोस्त मेरे
मैंने तुझ को तेरी आवाज़ से पहचान लिया
دیوانگی نہیں ہے اتنی سی دوستی ہے
میں انکو جانتا ہوں وہ مجھ کو جانتے ہیں
दीवानगी  नहीं  है  इतनी  सी  दोस्ती  है
मैं उनको जानता हूँ वे मुझको जानते हैं
کچھ تو مجبوریاں رہی ہونگی
یوں ہی کوئی بیوفا نہیں ہوتا
कुछ तो मजबूरियाँ रहीं होगी
यूँ ही कोई बेवफा नहीं होता........बसीर बद्र
भूक से तंग आकर अंगूठी भी बेच डाली
गरीबी का सांप तेरी निशानी निगल गया
सांस कह रही आस से के धीरज रखना सीख
बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख
بوئے خوں سے جی رُکا جاتاہے اے باد بہار
ہو گیا ہے چاک دِل شاید کسی دلگیر کا
इक तवायफ ने कहा रो के ये आइने से
रूह की कब्र को कुछ लोग बदन कहते हैं
شکوہ:शिकवा
اِدھر اُ دھر کی نہ بات کرइधर उधर की बात न कर
یہ بتا قافلہ کیوں لٹا यह बता काफला क्यों लुटा
مجھے رہزنوں سے نہیں گلہ मुझे रहज़नों से नहीं गीला
تیری رہبری کا سوال ہے तेरी रहबरी का सवाल है
جواب شکوہ:जवाबे शिकवा
نہ سوال کر نہ حساب لے न सवाल कर न हिसाब ले
ہم کسی کو نہیں ہیں جواب دہ हम किसी को नहीं हैं जवाबदेह
ہم ہیں رہزنوں کے بھی سرغنہ हम हैं रहज़नों के भी सरगना
میری رہبری کی تو داد دے मेरी रहबरी की तू दाद दे
فرعون بھی نمرود بھی گزرے ہیں جہاں میں
رہتاہے یہاں کون ، یہاں کون رہا ہے
تُم ظلم کہاں تک تہ افلاک کروگے
یہ بات نہ بھولو کہ ہمارا بھی خُدا ہے
اُجڑی اُجڑی ہوئی ہر آس لگے
زندگی رام كا بنواس لگے
تو ہے اک بہتی ہوئی ندیا کی طرح
تُجھ کو دیکھوں تو مُجھے پیاس لگے
उजड़ी  उजड़ी   हुई  हर  आस लगे
ज़िन्दगी   राम     का   बनवास   लगे
तू है एक बहती हुई नदिया की तरह
तुझको   देखूं   तो   मुझे  प्यास  लगे
آپ آئے جان آئی ساتھ ساتھ
ایک آنے میں دو آنا ہو گیا
आप आये जान आई साथ साथ
एक आने  में  दो आना  हो गया
گلوں میں رنگ بھرے بادِ نو بہار چلے
چلے بھی آؤ کہ گلشن کا کارو بار چلے
गुलों     में    रंग   भरे  बादे  नौ   बहार  चले
चले भी आओ कि गुलशन का करो बार चले
ہم ہوئے تم ہوۓ کہ میر ہوۓ
سب اُس زُلف کے اسیر ہوئے
हम हुए तुम हुए   कि मीर हुए
सब उस ज़ुल्फ़ के असीर हुए
چل دیئے سوئے حرم کوئے بتاں سے مومن
جب دیا رنج بتوں نے تو خدا یاد آیا
चल दिए सूए हरम कुए बुताँ से मोमिन
जब दिया रंज बुतों ने तो खुदा याद आया
خلافِ سرا ع شیخ کبھی تھوکتا نہیں
اندھیرے اجالے میں کبھی چوکتا نہیں
खेलाफ़े सरा शैख़ कभी थूकता नहीं
अँधेरे उजाले में कभी चुकता नहीं
वतन की रेत मुझे एड़ीयां रगड़ने दे
मुझे उम्मीद है पानी यहीं से निकले गा
کباب سیک ہیں ہم کروٹیں ہر سو بدلتے ھیں
جب جل اُٹھتا ہے یہ پہلو ، تو وه پہلو بدلتے ھیں
कबाबे सिक हैं हम ,करवटें हर सु बदलते हैं
जब जल उठता यह पहलू तो वो पहलु बदलते हैं
बेलिबास आये थे इस दुनिया में ग़ालिब
एक कफ़न के लिए इतना सफर कर गए ---ग़ालिब
ये कफ़न ये क़बर ये जनाज़े रस्मे शरीयत है इक़बाल
मर तो इंसान तभी जाता है जब कोई याद करने वाला न हो
क़द्रे गौहर शाह दानद या बदानद जौहरी
क़द्रे गुल बुलबुल बदानद क़द्रे दुलदुल रा अली
اُجالے اپنی یادوں کے ہمارے ساتھ رہنے دو
نہ جانے کس گلی میں زِندگی کی شام ہو جائے
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए...Bashir badr
तुम्हारे शहर में मैयत को सब कंधा नहीं देते
हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं ---मनौवर राणा
اے نئے سال بتا تجھ میں نیا پن کیا ہے
ہر طرف خلق نے کیوں شور مچا رکھا ہے
ऐ नए साल बता तुझ में नयापन क्या है
हर तरफ ख़ल्क़ ने क्यों शोर मचा रखा है
یہ چمن یوں ہی رہیگا اور ہزاروں بلبلیں
اپنی اپنی بولیاں سب بول کر اُڑ جائینگی
यह चमन यूँ ही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें
अपनी अपनी बोलियां सब बोल कर उड़ जाएँगी
ستاروں کو آنکھوں میں محفوظ رکھنا بہت دور تک رات ہی رات ہوگی
مسافر ہیں ہم بھی مسافر ہو تم بھی کسی موڑ پر پھر ملاقات ہوگی
सितारों को आंखों में महफूज रखना बहुत दूर तक रात ही रात होगी
मुसाफिर हैं हम भी मुसाफिर हो तुम भी किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी...Bashir badr
وہ آئے بزم میں اتنا تو میر نے دیکھا
پھر اسکے بعد چراغوں میں روشنی نہ رہی
वह आये बज़्म में  इतना तो  मीर ने देखा
फिर उसके बाद चिराग़ों में रौशनी न रही
تیری یاد ہے یا ہے تیرا تصور
کبھی داغ کو ہم نے تنہا نہ دیکھا
तेरी  याद  है  या  है  तेरा  तसौउर
कभी दाग़ को हमने तनहा न देखा
پہلو سے دو گھڑی جو سرکتے نہ تھے کبھی
گھبرا گئے ہیں دفن میں تاخیر دیکھ کر
पहलु से दो घड़ी जो सरकते न थे कभी
घबरा गए हैं दफ़्न में  ताख़ीर  देख कर
جنازہ روک کر میرا وہ اس انداز سے بولے
گلی میں نے کہی تھی تم تو دنیا چھوڑ جاتے ہو
जनाज़ा   रोक   कर मेरा वो  इस अंदाज़ से बोले
गली हम ने कही थी तुम तो दुनिया छोड़ जाते हो
چند کلیاں نشاط کی چن کر
مدتوں محوِ یاس رہتا ہوں
تُجھ سے ملنا خوشی کی بات سہی
تجھ سے ملکر اُداس رہتا ھوں
चंद  कलियाँ  निशात  की चुन कर
मुद्दतों   महवे     यास    रहता    हूँ
तुझ से मिलना ख़ुशी की बात सही
तुझ  से मिल  कर उदास  रहता हूँ
قتیل اپنا مقدر غم سے بیگانہ اگر ہوتا
تو پھر اپنے پرائے مجھ سے پہچانے کہاں جاتے
क़तील अपना मुक़द्दर ग़म से बेग़ाना अगर होता
तो फिर अपने पराये  मुझ से पहचाने कहाँ जाते
قِسمت پر اُس مسافر بیکس کی رو
ییے
گاڑی کھلی ہو جس کی نگاہوں کے سامنے
क़िस्मत पर उस मुसाफिर बेकस की रोइये
गाड़ी  खुली हो  जिसकी  निगाहों के सामने
یہ چمن یوں ہی رہے گا اور ہزاروں بلبلیں
اپنی اپنی بولیاں سب بول کر اُڑ جائینگی
यह चमन यूँ ही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें
अपनी अपनी बोलियां सब बोल कर उड़ जाएँगी
تیری مسکراہٹ سے سدھر جاتی ہے طبیعت میری
بتاؤ ، تم عشق کرتے ہو یا علاج؟
مکتبِ عشق کا دستور نرالا دیکھا
اسکو فرصت نہ ملی جسنے سبق یاد کیا
मकतबे इश्क़ का दस्तूर निरल देखा
उसको फुर्सत न मिली जिसने सबक़ याद किया....Mir Tahir Ali Rizvi
एक नज़र देख के सौ नुक्स निकाले मुझमें
फिर भी मैं खुश हूं कि मुझे गौर से देखा उसने
तन्हा कर गया वह शख्स सिर्फ इतना कहकर
सुना है मुहब्बत बढ़ती है बिछड़ जाने के बाद
آگاہ اپنی موت سے کوئ بسر نہیں
سامان سو برس کا ہے پل کی خبرنہیں
आगाह अपनी मौत से कोई बसर नहीं
सामान सौ बरस का है पल की खबर नहीं
मिलना था इत्तफाक बिछड़ना नसीब था
वह इतनी दूर हो गया जितना करीब था
दफना दिया गया मुझे चांदी की कब्र में
मैं जिसको चाहती थी वह लड़का गरीब था
جلا ہے جسم وہاں دِل بھی جل گیا ہوگا
کریدتے ہو راکھ جُستجُو کیا ہے
जला है जिस्म वहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो राख जुस्तजू क्या है
غیروں سے تو فرصت تمہیں دِن رات نہیں ہے
ہاں میرے لئے وقت ملاقات نہیں ہے
ग़ैरों से तो फुर्सत तुम्हें दिन रात नहीं है
हाँ मेरे लिए वक़्ते मुलाक़ात नहीं है
تر دامنی پر شیخ ہمارے نہ جائیو
دامن نچوڑ دیں تو فرشتے وضو کریں
तरदामनी पर शेख हमारे न जाइयो
दमन निचोड़ दें तो फरिश्ते वज़ू करें
تمھیں غیروں سے کب فرصت ،ہم اپنے غم سے کب خالی
چلو بس ہو چکا ملنا ،نه تم خالی نہ ہم خالی
तुम्हें ग़ैरों से कब फुर्सत ,हम अपने ग़म से कब ख़ाली
चलो बस हो चूका मिलना,न तुम ख़ाली ,न हम ख़ाली
تیری صورت سے ملتی نہیں کسی کی صورت
ہم جہاں میں تیری تصویر لئے پھرتے ہیں
तेरी सूरत से मिलती नहीं किसी की सूरत
हम जहाँ में तेरी तस्वीर लिए फिरते हैं
چاہت کا جب مزہ ہے کہ وہ بھی ہوں بیقرار
دونوں طرف ہو آگ برابر لگی ہوئی
चाहत का जब मज़ा है कि वो भी हों बेक़रार
दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई
تاریخ کی گھڑیوں نے وہ وقت بھی دیکھی ہے
لمحے نے خطا کی تھی صدیوں نے سزا پائی
तारीख़ की घड़ियों ने वह वक़्त भी देखी हैं
लम्हे ने  ख़ता की थी  सदियों ने सज़ा पाई
باغِ بہشت سے مجھے حکم سفر دیا تھا کیوں
کار جہاں دراز ہے تو میرا انتظار کر
बाग़े बहिस्त से मुझे हुक्मे सफर दिया था क्यों
कारे जहाँ दराज़ है तू मेरा इंतज़ार कर
نہ ہارا ہے عشق اور نہ دنیا تھکی ہے
دیا جل رہا ہے ہوا چل رہی ہے
न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है ......खुमार बाराबंकी
ایک جگہ رہتے نہیں عاشقِ بد نام کہیں
دن کہیں رات کہیں صبح کہیں شام کہیں
एक जगह रहते नहीं आशिक़े बदनाम कहीं
दिन कहीं रात कहीं सुब्ह कहीं शाम कहीं
اچھا تمھارے شہر کا دستور ہو گیا
جسکو گلے ملا لیا وہ دور ہو گیا
بشیر بدر
अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया
जिसको गले मिला लिया वह दूर हो गया
قسم لےلو خُدا کی جو تجھے دانستہ دیکھا ہو
نظر آخر نظر ہے بے ارادہ اٹھ گئی ہوگی
क़सम लेलो खुदा की जो तुझे दानिस्ता देखा हो
नज़र आखिर नज़र है बे इरादा उठ गई होगी
مِل کے ہوتی تھی کبہی عید بھی دیوالی بہی
اب یہ حالت ہے کہ ڈر ڈر کر گلے ملتے ہیں
मिल के होती थी कभी ईद भी दिवाली भी
अब यह हालत है की डर डर कर गले मिलते हैं
نگاہوں سے اشاروں کا ہنر ،اُنکا میخانہ سا تھا
دیدار کرتے کرتے نہ جانے کب دِل فصل گیا
جسکو بھی موقع ملتا ہے پیتا ضرور ہے
پتہ نہیں کیا مزا ہے غریبوں کے خون میں
जिसको भी मौक़ा मिलता है पिता ज़रूर है
पता नहीं क्या मज़ा है ग़रीबों के खून में
کرو مہربانی تو اہلِ زمیں پر
خُدا مہرباں ہوگا عرس بریں پر
करो मेहरबानी तू अहले ज़मीं पर
खुदा मेहरबाँ होगा अरसे बरीं पर
آ گلے مل لے اے ظالم عید کا ہے آج دن
رسمِ دُنیا بھی ہے موقع بھی ہے دستور بھی ہے
आ गले मिल ले ऐ ज़ालिम ईद का है आज दिन
रस्मे दुनिया   भी है मौक़ा भी   है दस्तूर भी है
ہے پردہ کل جو آئیں نظر چند بیبیاں
اکبر زمیں میں غیرت قومیں سے گڑ گیا
پوچھا جو میں نے آپ کا پردہ وہ کیا ہوا
کہنے لگیں کہ عقل پہ مردوں کے پڑ گیا
बेपर्दा कल जो    आईं नज़र   चंद बीबीयां
अकबर ज़मीन में ग़ैरते क़ौमी से गड़ गया
पूछा जो मैं ने आप का   पर्दा वो क्या हुआ
कहने लगीं कि  अक़्ल पे मर्दों के पड़ गया
ہم نے تو تدبیر سے تقدیر بدل دی ہے
وہ جوتشی سے ہاتھ دکھانے میں رہ گئے
हमने तो तदबीर से तक़दीर बदल दी है
वह ज्योतिषी से हाथ दिखने में रह गए
پھول کی پتی سے کٹ سکتا ہے ہیرے کا جگر
مرد ناداں پر کلامِ نرم نازُک بےاثر
फूल की पत्ती से कट सकता है हीरे का जिगर
मर्दे नादान पर कलामे नर्म नाज़ुक बे असर
मोहब्बत लीबास नहीं जो हर रोज उतारा जाय
मुहब्बत कफ़न है पहन कर उतारा नहीं जाता
रंग में भांग लागे ,भांग में धतूरा
जैसन के तैसन लागे संग चले पूरा
دامن پہ کوئی چھینٹ نہ خنجر پہ کوئی داغ
تم قتل کرے ہو یا کرامات کرے ہو
दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो...Kalim Ajiz
نہ خُدا ہی ملے نہ وصال صنم
نہ ادھر کے رہے نہ اُدھر کے رہے
न खुदा ही मिले न वसाले सनम
न इधर के    रहे न उधर के रहे
نگاہِ عیب جوئی سے جو دیکھا اہلِ آدم کو
کوئی کافر کوئی ملحد کوئی زندیق اکبر تھا
مگر دِل احتسابِ نفس پر جِس دم ہوا مائل
ہوا ثابت کہ ہر فرزندِ آدم مجھ سے بہتر تھا
निगाहे ऐब जुई से जो देखा अहले आदम को
कोई काफिर कोई मुलहिद कोइ जिनदीक अकबर था
मगर दिल एहतेसबे नफ्स पर जिस दम हुआ मायल
हुआ साबित कि हर फरजांदे आदम मुझ से बेहतर था
ہے جوانی خود جوانی کا سنگار
سادگی زیور ہے اس سن کے لئے
है जवानी खुद जवानी का सिंगार
सादगी ज़ेवर है इस सिन के लिए
کھیل سمجھا ہے غمِ دِل کو زمانہ اب تک
شمع کے چاروں طرف ڈھیر ہے پروانوں کا
खेल समझा है ग़मे दिल को ज़माना अबतक
शमा के चरों तरफ ढेर है परवानों का
ہم میں اور تم میں جُدائی ہوگی
یہ ہوا کسی دُشمن نے اڑائی ہوگی
हम में तुम में जुदाई होगी
यह हवा किसी दुश्मन ने उड़ाई होगी
مُجھ کو مٹا سکے يہ زمانے میں دم نہیں
ہے خد زمانہ ہم سے زمانے سے ہم نہیں
हम को मिटा सके यह ज़माने में दम नहीं
है खुद ज़माना हम से ज़माने से हम नहीं
رہائی پر بھی زنجیریں تعلّق کی نہیں ٹوٹیں
میری تصویر اُسنے کھینچ دی دیوارِ زِنداں پر
रेहाई पर भी ज़ंजीरें तअल्लुक़ की नहीं टूटीं
मेरी तस्वीर उसने खिंच दी दीवारे ज़िन्दाँ पर
بھائی ہیں دو حقیقی قِسمت جُدا جُدا ہے
ایک شاہ بنکے بیٹھا اک بینوا غدا ہے
भाई हैं दो हक़ीक़ी क़िस्मत जुदा जुदा है
एक शाह बन के बैठा एक बे नवा ग़दा है
جنگ زحمت ہو یا رحمت اب یہ بات نہ ہو
جنگ جب آ ہی گئی سر پہ تو رحمت ہوگی
जंग ज़हमत हो या रहमत अब यह बात न हो
जंग जब आ ही गई सर पर तो रहमत होगी
سیاہ بختی میں کب کوئی کسی کا ساتھ دیتا ہے
کہ تاریکی میں سایہ بھی جُدا اِنسان سے ہوتا
सेयह बख्ती में कब कोई किसी का साथ देता है
कि तारीकी में साया भी जुदा इंसान से होता
تو بچائے لاکھ دامن میرا پھر بہی ہے یہ دعویٰ
تیرے دِل میں میں ہی میں ہُوں کوئی دوسرا نہیں ہے
نام ہم نے لکھا تھا آنکہوں میں
آںسوں نے مٹا دیا ہوگا
آسماں بھر گیا پرندوں سے
پیڑ ہرا کویء گرا دیا ہوگا
नाम हम ने लिखा था आंखों में
आंसुओं ने मिटा दिया होगा
आसमान भर गया परिंदों से
पेड़ हरा कोइ गिरा दिया होगा
جن بہائیوں نے بانٹ کر کھائی تھیں ٹافیاں
تقسیمِ جائداد میں سر کاٹ رہے ہیں
जिन भाइयों ने बाँट कर खाई थीं टॉफियां
तक़सीमे जायदाद में सर काट रहे हैं
کسی کے عشق میں ماں باپ کو آنکھیں دکھاتے ہو
یہی ہے عشق تو بدتمیزی کِس کو کہتے ہیں
किसी के इश्क़ में मां बाप को आँखें देखते हो
यहीह इश्क़ तो बदतमीज़ी किस को कहते हैं
قسم خُدا کی بڑے تجربے سے کہتا ہوں
گناہ کرنے میں لذت تو ہے سکون نہیں
क़सम खुदा की बड़े तजरबे से कहता हूँ
गुनाह करने में लज़्ज़त है पर सकून नहीं
کر رہا تھا غمِ جہاں کا حساب
آج یاد تم بےحساب آئے
कर रहा था ग़मे जहाँ का हिसाब ....फैज़
आज    याद   तुम बेहिसाब आये
ہم نے مانا کہ تغافل نہ کروگے لیکن
خاک ہو جائیں گے ہم تم کو خبر ہونے تک
हमने माना   कि तग़ाफ़ुल   न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक
میری لحد پر پتنگوں کا خون ہوتا ہے
حضور شمع نہ لایا کریں جلانے کو
मेरी लेहद पे पतिंगों का खून होता है
हज़ूर शमा  न लाया  करें जलाने को
تو ادھر اُدھر کی بات نا کر مُجھے یہ بتا کہ کارواں کیوں لُٹا
مُجھے لوٹنے کا غم نہیں تیری رہبری کا سوال ہے
ہر اک بیگم اگرچہ منفرد ہے اپنے سج دھج میں
مگر جتنے بھی شوہر ہیں بیچارے ایک جیسے ہیں
हर एक बेगम अगरचे मुनफ़रिद है अपने सज धज में
मगर   जितने   भी   शौहर हैं     बेचारे   एक   जैसे हैं
بڑا شور سنتے تھے پہلو میں دل کا
جو چیرا تو ایک قطرہ خوں نکلا
बड़ा शोर सुनते थे   पहलु में दिल का
जो चीरा तो एक क़तरये खून निकला ...आतिश हैदर अली
دنیا نے میری بلندیاں دیکھیں
کسی نے پاؤں کے چھالے نہیں دیکھے
दुनिया ने  मेरी  बुलंदियां   देखी
किसी ने पाँव के छाले नहीं देखे
کعبہ کِس منھ سے جاؤگے غالبِ
شرم تم کو مگر نہیں آتی
काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शराम तुमको मगर नहीं आती
حد چاہئے سزا میں عقوبت کے واسطے
آخر تو گنہگار ہُوں کافر نہیں ہوں میں -- غالب
हद चाहिए सज़ा में अक़ूबत के वास्ते
आखिर तो गुनहगार हूँ काफिर नहीं हूँ मैं
ملنا تھا اتفاق بچھڑنا نصیب تھا
وہ اتنی دور ہو گیا جتنا قریب تھا
دفنا دِیا گیا مُجھے چاندی کی قبر میں
میں جس کو چاہتی تھی وہ لڑکا غریب تھا
मिलना था इत्तफाक बिछड़ना नसीब था
वह इतनी दूर हो गया जितना करीब था
दफना दिया गया मुझे चांदी की कब्र में
मैं जिसको चाहती थी वह लड़का गरीब था
اپنوں نے مجھے مارا غیروں میں کہاں دم تھا
کشتی میری ڈوبی جہاں پانی کم تھا
अपनों ने मुझे मारा ग़ैरों में कहाँ दम था
कश्ती   मेरी   डूबी जहाँ   पानी कम था
یا تو دیوانہ ہنسے یا تو جسے توفیق دے
ورنہ اس دنیا میں آکر مسکراتا کون ہے
या तो   दीवाना   हँसे या   तू जिसे तौफ़ीक़ दे
वरन इस दुनिया में आकर मुस्कुराता कौन है
بھائی ھیں دو حقیقی قِسمت جدا جدا ہے
ایک شاہ بنکر بیٹھا ایک بے نوا گدا ہے
भाई हैं दो हक़ीक़ी क़िस्मत जुदा जुदा है
एक शाह बन के बैठा एक बेनवा गदा है
رنج سے خوگر ہوا انساں تو مٹ جاتا ہے رنج
مشکلیں مجھ پر پڑیں اتنی کہ آساں ہو گئیں
रंज से खुगर हुआ इनसाँ तो मिट जाता हे रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं
آپ کو دیکھنے والے
سنا ہوںکہ نشہ نہیں کرتے
आप को देखने वाले
सुना हूँ कि नशा नहीं करते
دِل کے پھپھولے جل گئے سینے کے داغ سے
اِس گھر کو آگ لگ گئی گھر کے چراغ سے
दिल के फफोले जल गये साइन के दाग़ से
इस घर को आग लग गई घर के चिराग़ से
تم میرے خواب کی تعبیر اگر بن نہ سکے
میں تیرے خواب کی تعبیر بدل ڈالوںگا
तुम मेरे ख्वाब की ताबीर अगर बन न सके
मैं तेरे   ख्वाब की   ताबीर   बदल   डालूंगा
سنی رودادِ ہستی تو درمیاں سے سنی
نہ ابتدا کی خبر ہے نہ انتہا معلوم
सुनी रूदादे हस्ती तो दरमियाँ से सुनी
न इब्तदा की खबर है न इंतहा मालूम
دِل کے آئینے مین ہے تصویر یار
ایک ذرا گردن جھکائی دیکھ لی
दिल के आईने में है तसवीरे यार
एक ज़रा गर्दन झुकाई देख ली
ہم پیرویئے قیس نہ فرہاد کرینگے
ہم طرزِ جنوں اور ہی ایجاد کرینگے
हम पैरविये क़ैस न फरहाद करेंगे
हम तर्ज़े जानूँ और ही ईजाद करेंगे
یادِ ماضی عذاب ہے یارب
چھین لے حافظہ میرا
यादे माज़ी अज़ाब है या रब
छीन    ले    हाफ़िज़ा   मेरा
کہاں میں کہاں وصل جاناں کی حسرتِ
بہت ہے انہیں اک نظر دیکھ لینا
कहाँ मैं कहाँ वस्ल जानां की हसरत
बहुत  है उन्हें  एक नज़र देख लेना
ہم آہ بھی بھرتے ہیں تو ہو جاتے ہیں بد نام
وہ قتل بھی کرتے ہیں تو چرچا نہیں ہوتا
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो कत्ल  भी करते  हैं तो  चर्चा  नहीं होता
مگس کو باغ میں جانے نہ دینگے ہم
ناحق خون پروانوں کا ہوگا
मगस को बाग़ में जाने न देंगे हम
नाहक  खून   परवानों का   होगा
کبھی کہا نہ کسی سے تیرے فسانے کو
نہ جانے کیسے خبر ہو گئی زمانے کو
कभी कहा न किसी से तेरे फ़साने को
न जाने कैसे खबर हो गई ज़माने को
میری لحد پہ پتنگوں کا خون ہوتا ہے
حضور شمع نہ لایا کریں جلانے کو
قمر ذرا بھی نہیں تم کو خوفِ رُسوائی
چلے ہو چاندنی شب میں اُنہیں بلانے کو
मेरी लेहद पे पतिंगों का खून होता है
हज़ूर शमा न लाया करें जलने को
क़मर ज़रा भी नहीं तुम को ख़ौफ़े रुसवाई
चले हो चांदनी शब् में उन्हें बुलाने को
جاتی ہوئی میت دیکھ کے بھی للہ تم آٹھ کے آ نہ سکے
دو چار قدم تو دُشمن بھی تکلیف گوارا کرتے ہیں
जाती हुई मैयत देख के भी लिल्लाह तुम उठके आ न सके
दो चार क़दम तो दुश्मन भी तकलीफ गवारा करते हैं
دونوں جہان تیری محبت میں ہار کے
وہ جا رہا ہے کوئی شبِ غم گزار کے
ویراں ہے میکدہ خم و ساغر اُداس ہیں
تم کیا گئے کہ روٹھ گئے دن بہار کے
اک فرصتِ گناہ ملی وہ بھی چار دن
دیکھے ہیں ہمنے حوصلے پرور دگار کے
दोनों जहाँ तेरी मुहब्बत में हार के
वह जा रहा है कोई शबे ग़म गुज़ार के
वीरां है मैकदा ख़म व साग़र उदास हैं
तुम क्या गये कि रूठ गये दिन बहार के
एक फुर्सते गुनाह मिली वह भी चार दिन
देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के ...faiz ahmad faiz
دور سے آئے تھے ساقی سن کے میخانے کو ہم
بس ترستے ہی چلے افسوس پیمانے کو ہم
مئے بھی ہی مینا بھی ہے ساغر بھی ہے ساقی نہیں
دِل میں آتا ہے لگا دیں آگ میخانے کو ہم
दूर से आये थे साक़ी सुन के मैखाने को हम
बस तरसते ही चले अफ़सोस पैमाने को हम
मै भी है मीना भी है सागर भी है साक़ी नहीं
दिल में आता है लगा दें आग मैखाने को हम....nazir akbar abadi
آپ جن کے قریب ہوتے ہیں
وہ بڑے خوش نصیب ہوتے ہیں
جب طبیعت کسی پر آتی ہے
موت کے دن قریب ھوتے ھیں
आप जिन के क़रीब होते हैं
वह बड़े खुश नसीब होते हैं
जब तबियत किसी पर आती है
मौत के दिन क़रीब होते हैं.....
ایما ں مُجھے روکے ہے تو کھینچے ہے مجھے کُفر
کعبہ میرے پیچھے ہے کلیسا میرے آگے
گو ہاتھ میں جنبشِ نہیں آنکھوں میں تو دم ہے
رہنے دو ابھی ساغر و مینا میرے آگے
इमां मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है तो कलीसा मेरे आगे
जो हाथ में जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी सगरो मीना मेरे आगे....Ghalib
غمِ ہستی کا جزِ مرگ اسد کس سے ہو علاج
شمع ہر رنگ میں جلتی ہے سحر ہونے تک
ग़मे हस्ती का जुज़े मार्ग असद किस से हो इलाज
शमा हर रंग में जलती है सेहर होने तक .....Ghalib
جھکتا وہی ہے جسمیں جان ہوتی ہے
اکڑنا تو مردے کی پہچان ہوتی ہے
झुकता वही है जिस में जान होती है
अकड़ना तो मुर्दे की पहचान होती है
शौक से तोड़ो दिल मेरा मुझ को क्या हैरान करोगे
तुम ही तो रहते हो इसमें अपना ही घर वीरान करोगे
ख़ैर खून खांसी खुसी बैर प्रित मधुपान
रहिमन दाबे न दबे जानत सकल जहान
جن کے آنگن میں امیری کا سجر لگتا ہے
اُن کا ہر عیب زمانے کو ہنر لگتا ہے
محبّت میں تجارت نہیں اور تجارت میں محبت نہیں
जहां प्रेम होता है वहां हिसाब किताब(ब्यवसाय) नहीं होता और जहां हिसाब किताब होता है वहां प्रेम नहीं होता
Ghazal hai to hai - Dipti misra
قرضِ عاشقی میں دب کر شادی کئے تھے ماہر
اِک ہمسفر تو اُن کو انجان چاہئے تھا
جِس دن سے چلا ہوں میری منزِل پہ نظر ہے
آنکھوں نے کبھی میل کا پتھر نہیں دیکھا
जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
जो छुपा सके तुझे वह नेकाब कहां है गुलशन में तेरे जैसे गुलाब कहां है
آپ آئے تو مُجھ کو یاد آیا
زندگی نام ہے جدائی کا
आप आये तो मुझ को याद आया
ज़िन्दगी नाम है जुदाई का
اب آ گئے ہیں آپ تو آتا نہیں ہے یاد
ورنہ کچھ ہم کوآپ سے کہنا ضرور تھا۔ فراق گورکھپوری
अब आ गए हैं आप तो आता नहीं है याद
वरन आप से मुझ को कुछ कहना ज़रूर था
फ़िराक़ गोरखपुरी
اظہارِ مدعا کا ارادہ تھا آج کُچھ
تیور تمھارے دیکھ کر خاموش رہ گیا۔ شاد عظیمآبادی
इज़हारे मुददोआ का इरादा था आज कुछ
तेवर तुम्हारा देख कर खामोश रह गया
शाद अज़ीमाबादी
اگر دردِ محبّت سے نہ اِنسان آشنا ہوتا
نہ کچھ مرنے کا غم ہوتا نہ جینے کا مزا ہوتا۔
پنڈت برج نارائن چکبست
अगर दर्दे मोहब्बत से न इन्सां आशना होता
न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता
पंडित ब्रज नारायण चकबस्त
اُمید تو بندہ جاتی تسکین تو ہو جاتی
وعدہ نہ وفا کرتے وعدہ تو کئے ہوتے
چراغ حسن حسرت
उमीद तो बंध जाती तस्कीन तो हो जाती
वादा न वफ़ा करते वादा तो किये होते
चिराग़ हसन हसरत
اور کیا دیکھنے کو باقی ہے
آپ سے دِل لگا کر دیکھ لیا۔ فیض احمد فیض
और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लागर देख लिया
फैज़ अहमद फैज़
دِل ٹوٹنے سے تھوڑی سی تکلیف تو ہوئی
لیکن تمام عمر کا آرام مِل گیا
दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ तो हुई
लेकिन तमाम उम्र का आराम मिल गया
ایک وہی شخص مجھ کو یاد رہا
جِس کو سونچا تھا بھول جاؤنگا<
एक वही शख्स मुझ को याद रहा
जिस को सोंचा था भूल जाऊँगा
اپنا تو کام ہے کہ جلاتے چلو چراغ
راستے میں خواہ دوست یا دُشمن کا گھر ملے
अपना तो काम है कि जलाते चलो चिराग
रास्ते में खाह दोस्त या दुश्मन का घर मिले
کہ دو اُس کوہ کن سے کہ مرنا نہیں کمال
مر مر کر ہجر یار میں جینا کمال ہے
कह दो उस कोह कन से कि मरना नहीं कमाल
मर मर कर हिज़रे यार में जीना कमाल है
ये कहेंगे वो कहेंगे दिल में ठाने थे बहुत
चार आंखें होते ही सारा गिला जाता रहा
تم نے نہ کیا یاد کبھی بھول کر ہمیں
ہمنے تمہاری یاد میں سب کچھ بھلا دیا
بہادر شاہ ظفر
तुम ने न किया याद कभी भूल कर हमें
हम ने तुम्हारी याद में सब कुछ भुला दिया
बहादुर शाह ज़फर
محبت کو سمجھنا ہے تو ناصح خود محبت کر
کنارے سے کبھی اندازِ طوفاں نہیں ہوتا
मोहब्बत को समझना है तो नासेह खुद मोहब्बत कर
किनारे से कभी अन्दाज़ये तूफां नहीं होता
میں لوٹنے کے ارادہ سے جا رہا ہوں مگر
سفر سفر ہے میرا انتظار مت کرنا
मैं लौटने के इरादह से जा रहा हूँ मगर
सफर सफर है मेरा इंतज़ार मत करना
میں تو برباد ہو گیا ھوں مگر
اب کسی کو نہ آسرا دینا
मैं तो बर्बाद हो गया हूँ मगर
अब किसी को न आसरा देना देना
اس غزل کی شہرت رام پرساد بسمل کی وجہ سے بھی ہے، تاہم محققین نے اس حقیقت کو آشکارا کرنے کی کوشش کی ہے کہ اس غزل کے خالق رام پرساد بسمل نہیں بلکہ اس کے خالق بسمل عظیم آبادی تھے اور یہ غزل ان کے مجموعہ کلام’ حکایت ہستی’ میں موجود ہے۔ روایت ہے کہ جب رام پرساد بسمل کو پھانسی کا پھندا پہنایا گیا تو ان کی زبان پر اس غزل کا مطلع تھا۔
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
دیکھنا ہے زور کتنا بازوئے قاتل میں ہے
اے شہید ملک و ملت میں ترے اوپر نثار
لے تری ہمت کا چرچا غیر کی محفل میں ہے
وائے قسمت پاؤں کی اے ضعف کچھ چلتی نہیں
کارواں اپنا ابھی تک پہلی ہی منزل میں ہے
رہرو راہ محبت رہ نہ جانا راہ میں
لذت صحرا نوردی دورئ منزل میں ہے
شوق سے راہ محبت کی مصیبت جھیل لے
اک خوشی کا راز پنہاں جادۂ منزل میں ہے
آج پھر مقتل میں قاتل کہہ رہا ہے بار بار
آئیں وہ شوق شہادت جن کے جن کے دل میں ہے
مرنے والو آؤ اب گردن کٹاؤ شوق سے
یہ غنیمت وقت ہے خنجر کف قاتل میں ہے
مانع اظہار تم کو ہے حیا، ہم کو ادب
کچھ تمہارے دل کے اندر کچھ ہمارے دل میں ہے
مے کدہ سنسان خم الٹے پڑے ہیں جام چور
سرنگوں بیٹھا ہے ساقی جو تری محفل میں ہے
وقت آنے دے دکھا دیں گے تجھے اے آسماں
ہم ابھی سے کیوں بتائیں کیا ہمارے دل میں ہے
اب نہ اگلے ولولے ہیں اور نہ وہ ارماں کی بھیڑ
صرف مٹ جانے کی اک حسرت دل بسملؔ میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دِل میں ہے
دیکھنا ہے زور کتنا بازوئے قاتل میں ہے
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुये क़ातिल में है
ہم تو گھر سے نکلے ہی تھے باندہ کے سر پہ کن
جان ہتھیلی پر لئے لو، لے چلے ہیں یہ قدم
زندگی تو اپنی مہمان موت کی محفل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں
हम तो घर से ही थे निकले बाँधकर सर पर कफ़न,
जाँ हथेली पर लिए लो बढ चले हैं ये कदम.
ज़िंदगी तो अपनी मॆहमाँ मौत की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
ایک سے کرتا نہیں کیوں دوسرا کچھ بات چیت
دیکھتا ھوں میں جسے وہ چپ تیری محفل میں ہے
اے شہید ملک و ملت میں تیرے اوپر نثار
اب تیری ہمت کا چرچہ غیر کی محفل میں ہے
एक से , करता नहीं क्यूँ दूसरी कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा ग़ैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
ہے لئے ہتھیار دشمن تاک میں بیٹھا ادھر
اور ہم تیار ھیں سینہ لئے اپنا ادھر
خون سے کھیلیں گے ہولی گر وطن مشکل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
है लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर,
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर.
ख़ून से खेलेंगे होली अगर वतन मुश्क़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
मैं इस लिए जिंदा हूं कि मैं बोल रहा हूं
दुनिया किसी गूंगे की कहानी नहीं लिखती
دِل میں طوفاں کی ٹولی اور نسوں میں انقلاب
ھوش دشمن کے اڑا دیں گے ھمیں روکو نہ آج
دور رہ پائے جو ہم سے دم کہاں منزل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें रोको न आज.
दूर रह पाए जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
وقت آنے پر بتا دینگے تجھے اے آسماں
ہم ابھی سے کیا بتائیں کیا ہمارے دل میں ہے
वक़्त आने पर बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
کھینچ کر لا ئی ہے سب کو قتل ہونے کی اُمید
عاشقوں کا آج جمگھٹ کو چہ قاتل میں ہے
खिंच कर लाइ है सब को क़त्ल होने की उम्मीद
आशिक़ों का आज जमघट कुचये क़ातिल में है
ہاتھ جن میں ہوں جنوں کٹتے نہیں تلوار سے
سر جو آٹھ جاتے ھیں وہ ڈرتے نہیں للکار سے
हाथ जिन में हों जनूँ काटते नहीं तलवार से
सर जो उठ जाते हैं वो डरते नहीं ललकार से
اور بھڑکے گا جو شعلہ سا ہمارے دِل میں ہے
سرفروشی کی تمنا اب ہمارے دل میں ہے
और भड़के गा जो शोला सा हमारे दिल में है
सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
یوں کھڑا مقتل میں قاتل کہ رہا ہے بار بار
کیا تمنّائے شہادت بھی کسی کے دِل میں ہے
खड़ा मुक्तिल में क़ातिल कह रहा है बार बार
क्या तमन्नाये शहादत भी किसी के दिल में है
جسم بھی کیا جسم ہے جس میں نہ ہو خون جنوں
کیا لڑے طوفان سے جو کشتیِ ساحل میں ہے
जिस्म भी क्या जिस्म है जिस में न हो खूने जनूँ
क्या लड़े तूफ़ान से जो किश्तिये साहिल में है
کوئی مست ہے کوئی تیسنہ لب تو کسی کے ہاتھ میں جام ہے
مگر اسکا کوئی کرے بہی کیا يه تو میکدہ کا نظام ہے
कोई मस्त है तो कोई तिश्नये लब तो किसी के हाथ में जाम है
मगर इसका कोई करे भी क्या यह तो मैकदा का नज़ाम है
کہتے ہیں عشق نام کے گزرے ہیں ایک بزرگ
ہم لوگ بھی مرید اسی سلسلے کے ہیں
कहते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं एक बुजरुग
हम लोग भी मुरीद उसी सिलसिले के है
ہمدردیاں خلوص دلاسے تسلیاں
دِل ٹوٹنے کے بعد تماشے بہت ہوئے
हमदर्दियां ,खुलूस दिलासे तसल्लियाँ
दिल टूटने के बाद तमाशे बहुत हुए
ہم بھی دریا ھیں ہمیں اپنا ہنر معلوم معلوم ہے
جِس طرف چل پڑیں راستہ بن جائیگا
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ चल दें रास्ता बन जायेगा
ہم محبت کی انتہا کر دیں
ہاں مگر ابتدا کرے کوئی
हम मुहब्बत की इंतहा कर दें
हाँ मगर इब्तदा करे कोई
سو جاتے ہیں پھوٹ پا تھ پر اخبار بچھا کر
مزدور کبھی نیند کی گولی نھیں کھاتے
सो जाते है फुटपाथ पर अख़बार बिछा कर
मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते ....म राणा
ہزار اسبابِ راحت ہوں اسیری پھر اسیری ہے
قفس میں آ ہی جاتا ہے خیالِ آشیاں پھر بھی
हज़ार असबाबे राहत हों असीरी फिर असीरी है
क़फ़स में आ ही जाता है ख़याले आशयां फिर भी
ایک چھوٹا گناہ محبت کا
زندگی بھر حساب لیتا ہے
एक छोटा गुनाह मुहब्बत का
ज़िन्दगी भर हिसाब लेता है
چاہت بھرے وہ لفظ اور ہر لفظ میں دعا
مقروض کر دیا ہمیں تیرے خلوص
نے
चाहत भरे वह लफ्ज़ और हर लफ्ज़ में दुआ
मक़रूज़ करदिया हमें तेरे खुलूस ने
میں غریب کا بچّہ تہا اس لئے بھوکا رہ گیا
پیٹ بھر گیا جو کتا امیروں کا تھا
मैं ग़रीब का बच्चा था इसलिए भूका रह गया
पेट भर गया जो कुत्ता अमीरों का था
دل بہی تو نے بنایا اور نصیب بھی اے خدا
پھر وہ دل میں کیوں جو نصیب میں نہیں
दिल भी तूने बनाया और नसीब भी ऐ खुदा
फिर वह दिल में क्यों जो नसीब में नहीं
شاید اسی کا نام محبت ہے شیفتہ
اِک آگ سی ہے سینے کے اندر لگی ہوئی<
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शायद इसी का नाम मुहब्बत है शैफ्ता
<
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एक आग सी है सीने के अंदर लगी हुई
یہ چمن یوں ہی رہیگا اور ہزاروں بلبلیں
اپنی اپنی بولیاں سب بول کر اُڑ جائینگی
यह चमन यूं ही रहेगा और हज़ारों बुलबुलें
अपनी अपनी बोलियां सब बोल कर उड़ जाएंगी
کسی کا عشق کسی کا خیال تھے ہم بھی
گئے دِنوں میں بہت باکمال تھے ہم بھی
ہماری کھوج میں رہتی تھیں تتلیاں اکثر
کہ اپنے شہر کا حُسن و جمال تھے ہم بھی
شاکر پروین
किसी का इश्क किसी का ख्याल थे हम भी
गए दिनों में बहुत बा कमल थे हम भी
हमारी खोज में रहती थीं तितलियाँ अक्सर
कि अपने शहर का हुस्न व जमाल थे हम भी
शाकिर परवीन
वह कहीं भी गया लौटा तो मेरे पास आया
बस यही बात है अच्छी मेरे हरजाइ की
शाकिर परवीन
ہم بھی دریا ہیں ہمیں اپنا ہنر معلوم ہے
جس طرف بھی چل پڑینگے راستہ ہو جائیگا
कुर्सी है तुम्हारा यह जनाजा तो नहीं है
कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते --irtiza nishat
جب تک نہ لگے بے وفائی کی ٹھوکر
ہر کسی کو اپنی محبّت پر ناز ہوتا ہے
जब तक न लगे बेवफाई की ठोकर
हर किसी को अपनी मुहब्बत पर नाज़ होता है
دو رنگی چھوڑ اک رنگ ہو جا
سرا سر موم یا سنگ ہو جا
दो रंगी छोड़ एक रंग हो जा
सरासर मोम या संग हो जा
यह इश्क नहीं आसान बस इतना ही समझ लीजिए
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है
یہ عشق نہیں آساں اتنا ہی سمجھ لیجیے
ایک آگ کا دریا ہے اور ڈوب کے جانا ہے
अपनों ने मुझे मारा गैरों में कहां दम था
कश्ती मेरी डुबी जहां पनी कम था
اپنوں نے مجھے مارا غیروں میں کہاں دم تھا
کشتی میری ڈوبی جہاں پانی کم تھا
نہیں شکوہ مُجھے کچھ بے وفائی کا تیری ہرگز
گلہ تب ہوا گر تونے کسی سے بھی نبھائی ہو
नहीं शिकवा मुझे कुछ बे वफ़ाई का तेरी हरगिज़
गीला तब हो अगर तूने किसी से भी निभाई हो
مجھ کو تو ہوش نہیں تم کو خبر ہو شاید
لوگ کہتے ہیں کہ تم نے مجھے برباد کیا
मुझ को तो होश नहीं तुम को खबर हो शायद
लोग कहते हैं कि तुम ने मुझे बर्बाद किया
جو ہو اجازت تو تم سے ایک بات پوچھوں
جو ہم سے عشق سیکھا تہا وہ اب کس سے کرتے ہو
जो हो इजाज़त तो तुम से एक बात पूछूं
जो हम से इश्क़ सीखा था वह अब किस से करते हो
ایک پل کے لئے چلے آؤ
دِل کو شاید قرار آ جائے
एक पल के लिए चले आओ
दिल को शायद क़रार आ जाये
یک تبسّم ہزار شکوں کا
کتنا پیارا جواب ہوتا ہے
एक तबस्सुम हज़ार शिकओं का
कितना प्यारा जवाब होता है
سو بار کہا خود سے وہ کوئی نہیں میرا
ہر بار صدا آئی تم دِل سے نہیں کہتے
सौ बार कहा उस से वह कोई नहीं मेरा
हर बार सदा आई तुम दिल से नहीं कहते
غضب آیا ستم ٹوٹا قیامت ہو گئی برپا
فقط اتنا ہی پوچھا تھا کہ تم کو پیار ہے ہم سے
ग़ज़ब आया सितम टुटा क़यामत हो गई बरपा
फ़क़त इतना ही पूछा था कि तुम को प्यार है हम से
کل چودہیں کی رات تھی شب بھر رہا چرچا تیرا
کُچھ نے کہا یہ چاند ہے کچھ نے کہا چہرہ تیرا
कल चौदहीं की रात थी शब् भर रहा चर्चा तेरा
कुछ ने कहा यह चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तेरा
میرےدِل کی تسلّی کے لئے فقط اتنا ہی کافی ہے
ہوا جو تم کو چھوتی ہے میں اُس میں سانس لیتا ہوں
मेरे दिल की तसल्ली के लिए फ़क़त इतना ही काफी है
हवा जो तुम को छूती है मैं उसमें साँस लेता हूँ
वह लोग जिनका हक़ था गुमनाम मर गए
ये नाम ये मर्तबा हमारा फरेब है
کعبہ کس منہ سے جاؤ گے غالب
شرم تم کو مگر نہیں آتی
پیروڈی
بیوی رکھ کر عاشقی غالب
شرم تم کو مگر نہیں آتی
काबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब
शरम तुम को मगर नहीं आती
बीवी रख कर आशकी ग़ालिब
शरम तुम को मगर नहीं आती
مُدّتوں ہم نے تیری يوں بھی زیارت کی ہے
با وضو ہو کے تیرے خط کی تلاوت کی ہے
تُم تو میرے تھے کسی اور کے ہوکے تُم نے
یُوں سمجھ لو کہ امانت میں خیانت کی ہے
تیشہ بغیر مر نہ سکا کوہ کن اسد
سر گستہ خمار رسوم و قیود تھا
तीसा बग़ैर मर न सका कोह्कुन असद
सरगुस्तए खुमार रसूमो क़यूद था
اے زندگی کیا ہے تُجھے معلوم تیرے واسطے
کن بہانوں سے طبیعت راہ پر لائی گئی
ऐ ज़िन्दगी क्या है तुझे मालूम तेरे वास्ते
किन बहनों से तबियत राह पर लाइ गई
رقیبوں نے رپٹ لکھوائی ہے جا جا کے تھانے میں
کہ اکبر نام لیتا ہے خُدا کا اِس زمانے میں
रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा जा के थाने में
कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में
بس يه ہوا کہ اس نے تکلّف سے بات کی
اور ہم نے روتے روتے دوپٹے بھگو لیۓ
عمر تو ساری کٹی عشق بتاں میں مومن
آخری وقت میں کیا خاک مسلماں ہوگا
उम्र तो सारी कटी इश्क़े बुताँ में मोमिन
आख़री वक़्त में क्या खाक मुसलमां होगा
تو ہی اگر نہ چاہے تو باتیں ہزار ہیں
तूही अगर न चाहे तो बातें हाज़र हैं
خنجر چلے کسی پر مرتے ہیں غم میں میر
سارے جہاں کا درد ہمارے جگر میں ہے
खंजर चले किसी पर मरते हैं ग़म में मीर
सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है
رہائی پر بھی زنجیریں تعلّق کی نہیں ٹوٹیں
میری تصویر اُسنے کھینچ دی دیوارِ زنداں پر
रिहाई पर भी ज़ंजीरें तअल्लुक़ की नहीं टूटीं
मेरी तस्वीर उसने खिंच दी दीवारे ज़िन्दाँ पर
بیوقوفوں کی کمی نہیں غا لب
ایک ڈھونڈیے ہزار ملتے ہی
ں نقد خوجئے اُدھار ملتے ہیں
बेवक़ूफ़ों की कमी नहीं ग़ालिब
एक ढोंढिये हज़ार मिलते हैं नक़द खोजो उधर मिलते हैं
برگِ حنا پر جاکے لکھوں دردِ دِل کی بات
تاکہ وہ لگے رفتہ رَفتہ دِل روبا کے ہاتھ
बर्गे हेना पर जा के लिखूँ दर्दे दिल की बात
ताकि वह लगे रफ्ता रफ्ता दिलरुबा के हाथ
اگر خلاف ہیں ہونے دو جان تھوڑی ہے
یہ سب دھنواں ہے کوئی آسمان تھوڑی ہے
لگیگی آگ تو آئینگے گھر کئی زد میں
یہاں پے صرف ہمارا مکان تھوڑی ہے
جو آج صاحبِ مسند ہیں کل نہیں ہونگے
کّرآیا دا ر ہیں ذاتی مکان تھوڑی ہے
سبھی کا خون ہے شامل یہاں کی مٹی میں
کسی کے باپ کا ہندوستان تھوڑی ہے
راحت اندوری
राहत इंदौरी
अगर खिलाफ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआं है कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में
यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं जाती मकान थोड़ी है
सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में
किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है
کعبہ اگر جو ٹوٹا تو کیا جائے غم ہے شیخ
یہ قصرِ دِل نہیں جو بنایا نہ جائیگا
काबा अगर जो टूटा तो क्या जाये ग़म है शैख़
यह कसरे दिल नहीं जो बनाया न जाएगा
بدل کر فقیروں کا ہم بھیس غالب
تماشائے اہلِ کرم دیکھتے ھیں
बदल कर फ़क़ीरों का हम भेस ग़ालिब
तमाशाये अहले करम देखते हैं
بڑے لوگوں سے ملنے میں ہمیشہ فاصلا رکھنا
جہاں دریا سمندر سے ملا دریا نہیں رہتا ۔۔ بشیر بدر
बड़े लोगों से मिलने में हमेसा फैसला रखना
जहाँ दरया समुन्दर से मिला दरया नहीं रहता
बसीर बद्र
جلا ہے جسم وہاں دِل بھی جل گیا ہوگا
کریدتے ہو راکھ جستجو کیا ہے
غالب
जला है जिस्म वहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो राख जुस्तजू क्या है
ارمان بھرے دِل میں ارمان ہزاروں ہیں
چھوٹا سا ہے گھر مہمان ہزاروں ہیں
अरमान भरे दिल में अरमान हज़ारों हैं
छोटा सा है घर मेहमान हज़ारों हैं
خنجر چلے کسی پر مرتے ہیں غم میں میر
سارے جہاں کا درد ہمارے جگر میں ہے
खंजर चले किसी पर मरते हैं ग़म में मीर
सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है
کتنا آسان تھا تیرے ہجر میں مرنا جاناں
پھر بھی اک عمر لگی جان سے جاتے جاتے
कितना आसान था तेरे हिज्र में मरना जानाँ
फिर भी एक उम्र लगी जान से जाते जाते
عشق کے قصے نہ چھیڑو دوستو
میں اسی میدان میں ہارا تھا کبھی
کون کہہ سکتا ہے اسکو دیکھ کر
یہ وہی ہے جو ہمارا تھا کبہی
इश्क़ के क़िस्से न छेड़ो दोस्तो
मैं इसी मैदान में हारा था कभी
कौन कह सकता है उस को देख कर
ये वही है जो हमारा था कभी
کسی کی ہوکے دوبارہ نہ آنا میری طرف
محبت میں حلالا حرام ہوتا ہے
किसी की होके दुबारा न आना मेरी तरफ
मोहब्बतों में हलाला हराम होता है
دفنا دیا گیا مُجھے چاندی کی قبر میں
میں جسکو چاہتی تھی وہ لڑکا غریب تھا
दफना दिया गया मुझे चांदी की क़ब्र में
मैं जिसको चाहती थी वह लड़का ग़रीब था
یہ خنک خنک ہوائیں یہ جھکی جُھکی گھٹائیں
وہ نظر بھی کیا نظر ہے جو سمجھ نہ لے اشارہ
ये खनक खनक हवाएं ये झुकी झुकी घटाएं
वो नज़र भी क्या नज़र है जो समझ न ले इशारा
دِل ٹوٹنے سے تھوڑی سی تکلیف تو ہوئی
لیکن تمام عمر کا آرام مِل گیا
दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ तो हुई
लेकिन तमाम उम्र का आराम मिल गया
گناہ کرکے کہاں جاؤگے غالبِ
یہ زمیں یہ آسماں اُسی کی ہے
गुनाह कर के कहाँ जाओगे ग़ालिब
यह ज़मीन ये आसमां उसी की है
آئینہ بھی تم پے شیدا ہو گیا
لو! ایک اور دُشمن پیدا ہو گیا
आइना भी तुम पे शैदा हो गया
लो ! एक और दुसमन पैदा हो गया
پرائی عورت تاڑ کا سایہ
بہت دیر تک کام نہ آیا
पराई नारी ताड़ का साया
बहुत देर तक काम न आया
آ ہی جاتا وہ راہ پر غالب
کوئی دِن اور بھی جۓ ہوتے
आ ही जाता वो राह पर 'ग़ालिब'
कोई दिन और भी जिए होते
رنج سے خوگر ہوا انساں تو مٹ جاتا ہے رنج
مشکلیں مجھ پر پڑیں اتنی کہ آساں ہو گئیں
रंज से खुगर हुआ इनसाँ तो मिट जाता हे रंज
मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसाँ हो गईं--ग़ालिब
جذبہء عشق سلامت رہا تو انشاء اللہ
کچے دھاگے میں چلے آئینگے سرکار بندھے
जज़्बए इश्क़ सलामत रहा तो इंसा अल्लाह
कच्चे धागे से चले आएंगे सर्कार बंधे
Tum ne diye jo zakhm wo nasoor hogaye
سب سے نہ ملا کرو اس سادگی کے ساتھ
یہ دور الگ ہے یہ لوگ الگ ہیں
सब से न मिला करो इस सादगी के साथ
ये दौर अलग है ये लोग अलग हैं
بڑے لُطف سے سن رہا تھا زمانہ
ہمیں سو گئے داستاں کہتے کہتے
बड़े लुत्फ से सुन रहा था ज़माना
हमीं सो गए दास्तां कहते कहते
ایک تیرا ہی خیال آتا ہے
جب بات چلتی ہے محبّت کی
एक तेरा ही ख़्याल आता है
जब बात चलती है मुहब्बत की
کُچھ دِن شاخ پر بسیرا تھا
میں سمجھتا تھا باغ میرا تھا
कुछ दिन शाख पर बसेरा था
मैं समझता था बाग़ मेरा था
न बक नासेह वही होगा जो कुछ किस्मत में होना है
तू अपना ही गायेगा मुझे अपना ही रोना है
कह दो उस कोहकन से कि मरना नहीं कमल
मर मर कर हिजरे यार में जीना कमाल है
हम जान फिद करते गर वादा वफ़ा होता
मरना ही मुक़द्दर था आजाते तो क्या होता
वह तो काम ज़र्फ़ हैं जो पी के बहक जाते हैं
वतन की रेत मुझे एंडियां रगड़ने दे
मुझे उम्मीद है पानी यहीं से निकलेगा
खंजर चले किसी पर मरते हैं ग़म में मीर
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है
दिल के फफोले जल सीने के दाग़ से
इस घर को आग लग गई घर के चिराग़ से
खंजर चले किसी पर मरते हैं ग़म में मीर
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है
वह आये बज़्म में इतना तो मीर ने देखा
फिर उसके बाद चिराग़ों में रौशनी न रही
हम हुए तुम हुए कि मीर हुए
सब उस ज़ुल्फ़ के असीर हुए
نہ رکی وقت کی گردِش نہ زمانہ بدلا
پیڑ سوکھا تو پرندوں نے ٹھکانہ بدلا
न रुकी वक़्त की गर्दिश न ज़माना बदला
पेड़ सूखा तो परिंदों ने ठिकाना बदला
گناہ میں کرتا یہ ہماری جرات تھی
تیرے کرم نے بنایا گنہگار مُجھے
गुनाह मैं करता यह हमारी हिम्मत थी
तेरे करम ने बनाया गुनहगार मुझे
फूल सर चढ़ा जो चमन से निकल गया
इज्जत उसे मिली जो वतन से निकल गया
अहले गौहर को वतन में रहने देता गर फलक
लाल क्यों फिर हिंद में आता बदख्शां छोड़ कर
خنز چلے کسی پر مرتے ہیں غم میں میر
سارے جہاں کا درد ہمارے جگر میں ہے
खंजर चले किसी पर मरते हैं ग़म में मीर
सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है
شہر میں کرتا تھا جو سانپ کے کاٹے کا علاج
اُسکے تہ خانے میں سانپوں کے ٹھکانے نکلے
शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ
कीजिए मुझे कबुल मेरी हर कमी के साथ
तुम मुझे नहीं छोड़ोगे यह तो मुझे पता था
तुम मुझे कहीं का नहीं छोड़ोगे यह मुझे नहीं पता थे
तेरे आज़ाद बन्दों की न यह दुनिया न वह दुनिया
यहाँ मरने की पाबन्दी वहां जीने की पाबन्दी
Ham mawahhid hain hmara kesh hai tarke rasoom
Millaten jab mit gain ajzaye iman ho gain
हम मवहिद हैं हमारा केस है तर्के रसूम
मिल्लतें जब मिट गईं अज्जाय ईमां हो गईं
करूं मैं दुश्मनी किस से जो दुश्मन भी हो दोस्त अपना
मोहब्बत ने न छोड़ी है जगह दिल में अदावत की
कीड़ा मकुड़ा में बेंग बरियार
मंगरू के गांव में ढोड़ाई हुंशियार
हमीं जब न होंगे तो क्या रंगे महफिल
किसे देख कर आप शर्माइएगा
मैं तेरे पास कोई तेरे जैसा ढूंढता हूं जो बेवफाई करे और बेवफा न लगे
हजार इश्क करो लेकिन इतना ध्यान रहे कि तुम को पहली मुहब्बत की बद दुआ न लगे
सब दरख़तन में बरगद बढ़
हरिहर हरिहर पत्ता उसमें लाल लाल फल
अब तेरे आने का गम न अब तेरे जाने का ग़म
बीत गया जमाना वह जब तेरे दीवाने थे हम
اب گزری ہوئی عُمر كو آواز نہ دینا اب دھول میں لپٹا ہوا بچپن نہ ملےگا انوار جلالپوری
وہ دیکھتاہے ہے مُجھ کو مگر بےحیا نہیں مَیں دیکھنے لگوں تو مُجھے دیکھتا نہیں
قید حیات و بند غم دونوں اصل میں ایک ہیں
موت سے پہلے آدمی غم سے نجات پائے کیوں
क़ैदऐ हेयात व बंदे ग़म दोनों असल में एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों
اب نزع کا عالم ہے مجھ پر تم اپنی محبت واپس لو
جب کشتی ڈوبنے لگتی ہے تو بوجھ اُتارا کرتے ہیں
अब नज़ा का आलम है मुझ पर तुम अपनी मुहब्बत वापस लो
जब किश्ती डूबने लगती है तो बोझ उतारा करते हैं
ساری چیزیں اسی دُنیا میں ہیں - بدقسمت کو نہیں ملتی ہیں
सकल पदारथ यही जग माही
कर्महीन नर पावत नाही
न जाने कितने चिरागों को मिल गई शोहरत
एक आफताब के बेवक्त डूब जाने से
ये जब्ऱ भी देखा है तारीख की नजरों ने
लम्हे ने खता की थी सदियों ने सज़ा पाई
मुजफ्फर रजमी
जानता था कि सितमगर है मगर क्या कीजिए
दिल लगाने के लिए और कोई था भी नहीं
कलीम आजिज
आदमियत और शै है इल्म है कुछ और चीज़
लाख तोते को पढ़ाया पर वह हैवान ही रहा
اِتنا لئے ہیں مہر و مروّت کی آڑ میں
ہم سے کسی نے ہاتھ ملایا تو ڈر گئے
را قب مختار
मैं नहीं जानता कागज पर लिखा सजरा
बात करने से कबीले का पता चलता है
شکوے ظلمتِ شب سے تو کہیں بہتر تھا
اپنے حصے کا کوئ شمع جلاتے جاتے
اس سادگی پر کون نہ مر جائے اے خدا
لڑتے ھیں اور ہاتھ میں تلوار بھی نہیں
इस सादगी पर कौन न मर जाय ऐ खुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं
खोल दे बाबे मैकदा साकी
एक फरिश्ता भी तेरे इंतजार में है
यह कहेंगे वह कहेंगे दिल में ठाने थे बहुत
चार आँखें होते ही सारा गिला जाता रहा
इतना तो हुआ फायदा बारिश की कमी का
इस शहर में अब कोई फिसल कर नहीं गिरता
خست اوّل می کنددِ معمار کج
تا ثریّا می رود دیوار کج
خست اوّل می کنددِ معمار کج تا ثریّا می رود دیوار کج
उर्दू को हम एक रोज़ मिटा देंगे जहां से
ये बात भी कमबख्त ने उर्दू में कही है
वह तो कमज़र्फ हैं जो पी के बहक जाते है
नशा शराब में होता तो नाचती बोतल
پریم نہ جانے ذات کوزات
بھوک نہ جانے جوٹھی بھات
نیند نہ جانے ٹوٹی کھا ٹ
پیاس نہ جانے دھوبی گھاٹ
प्रेम न जाने जात कुजात
भूख न जाने जूठी भात
नींद न जाने टूटी खाट
प्यास न जाने धोबी घाट
फूल की पट्टी से कट सकता है हीरे का जिगर
मर्दे नादाँ पर कलामे नरम नाज़ुक बेअसर
मैंने वो खोया जो नहीं था मेरा
तुमने वो खोया जो सिर्फ तुम्हारा था
خست اوّل می کند معمار کج
تا ثر یا می رود دِیوار کج
अगर राज मिस्त्री घर के पहली ईंट को टेंढा रख दे तो दीवार सुरैया तारा तक भी जाएगी तो टेंढ़ी ही जायेगी
वो आएगा नुमाइश ए सामान देखकर
क्यों कारोबार छोड़ दूं नुक़सान देखकर
नख़रे उठा रही हूं तुम्हारी तलाश के
रुकती नहीं हूं रास्ता वीरान देखकर
सोचा नहीं था मैंने कभी तेरे जैसा शख़्स
मुंह फेर लेगा मुझको परेशान देखकर
वो तेरा लम्स वो तिरि बाहों की ख़ुशबुएं
लौटी हूं जैसे कोई गुलिस्तान देखकर
तू लाख बेवफ़ा है मगर सर उठा के चल
दिल रो पड़ेगा तुझको पशेमान देखकर
ज़ाहिर न हो कि मुझसे तेरा वास्ता भी है
सबकी नज़र है तुझपे मेरी जान देखकर
हिमांशी बाबरा
کاش آجائے وہ مجھے جاں سےگذرتے دیکھے
اسکی خواھش تھی مجھ کو بکھرتے دیکھے
وہ سلیقے سے ھوئے ھم سے گریزاں ورنہ
لوگ تو صاف محبت میں مکرتے دیکھے
وقت ھوتا ھے ہر ایک ذخم کا مرھم.محسن.
پھر بھی کچھ زخم تھے ایسے جو نہ بھرتے دیکھے
۔۔۔ 💝🌹
اب تیرے انتظار کی عادت نہیں رہی
پہلے کی طرح گویا محبت نہیں رہی
ذوق نظر ہمارا بڑھا ہے کچھ اس طرح
تیرے جمال پر بھی قناعت نہیں رہی
فرقت میں اس کی روز ہی ہوتی تھی اک غزل
اب شاعری ذریعۂ راحت نہیں رہی
دنیا نے تیرے غم سے بھی بیگانہ کر دیا
اب دل میں تیرے وصل کی چاہت نہیں رہی
کچھ ہم بھی تھک گئے ترے در پر کھڑے کھڑے
تم میں بھی پہلے جیسی سخاوت نہیں رہی
#شازیہ_اکبر
साहिर लुधियानवी के 20 मशहूर शेर
1.कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया
बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया
2.ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहां
मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया
3.अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं
तुम ने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी
4.ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है
क्यूं देखें ज़िंदगी को किसी की नज़र से हम
5.अभी न छेड़ मोहब्बत के गीत ऐ मुतरिब
अभी हयात का माहौल ख़ुश-गवार नहीं
6.हम ग़म-ज़दा हैं लाएं कहां से ख़ुशी के गीत
देंगे वही जो पाएंगे इस ज़िंदगी से हम
7.बर्बादियों का सोग मनाना फ़ुज़ूल था
बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया
8.माना कि इस ज़मीं को न गुलज़ार कर सके
कुछ ख़ार कम तो कर गए गुज़रे जिधर से हम
9.संसार की हर शय का इतना ही फ़साना है
इक धुंद से आना है इक धुंद में जाना है
10.जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
11.अरे ओ आसमां वाले बता इस में बुरा क्या है
ख़ुशी के चार झोंके गर इधर से भी गुज़र जाएं
12.इस तरफ़ से गुज़रे थे क़ाफ़िले बहारों के
आज तक सुलगते हैं ज़ख़्म रहगुज़ारों के
13.वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बरबाद किया है
इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा
14.तिरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएं
वही आंसू वही आहें वही ग़म है जिधर जाएं
15.पेड़ों के बाज़ुओं में महकती है चांदनी
बेचैन हो रहे हैं ख़यालात क्या करें
16.राह कहां से है ये राह कहां तक है
ये राज़ कोई राही समझा है न जाना है
17.ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचियता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे
18.ज़मीं सख़्त है आसमां दूर है
बसर हो सके तो बसर कीजिए
19.किस दर्जा दिल-शिकन थे मोहब्बत के हादसे
हम ज़िंदगी में फिर कोई अरमां न कर सके
20.यूं ही दिल ने चाहा था रोना-रुलाना
तिरी याद तो बन गई इक बहाना
हसरत जयपुरी के 10 बेहतरीन शेर
1.दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे
हर रस्म-ए-मोहब्बत को मिटाने के लिए आ
2.ख़ुदा जाने किस-किस की ये जान लेगी
वो क़ातिल अदा वो सबा महकी महकी
3.हम रातों को उठ उठ के जिन के लिए रोते हैं
वो ग़ैर की बांहों में आराम से सोते हैं
4.उस मैकदे की राह मे गिर जाऊं न कहीं
अब मेरा हाथ थाम तो लो मैं नशे में हूं
5.प्यार सच्चा हो तो राहें भी निकल आती हैं
बिजलियां अर्श से ख़ुद रास्ता दिखलाती हैं
6.कहने को वो हसीन थे आंखें थीं बेवफ़ा
दामन मेरी नज़र से बचा कर चले गए
7.जाने क्यों तेज़ हुई जाती है दिल की धड़कन
चुटकियां लेती है क्यों सीने में मीठी सी चुभन
8.किस वास्ते लिक्खा है हथेली पे मेरा नाम
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूं नहीं देते
9.हम अश्क़ जुदाई के गिरने ही नहीं देते
बेचैन सी पलकों में मोती से पिरोते हैं
10.किस वास्ते लिक्खा है हथेली पे मिरा नाम
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते
मिरे जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा
गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न कर
अगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा
उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिफ़
हमें यक़ीं था हमारा क़ुसूर निकलेगा
यक़ीं न आए तो इक बात पूछ कर देखो
जो हँस रहा है वो ज़ख़्मों से चूर निकलेगा
उस आस्तीन से अश्कों को पोछने वाले
उस आस्तीन से ख़ंजर ज़रूर निकलेगा
अमीर क़ज़लबाश
ہر آدمی میں ہوتے ہیں دس بیس آدمی
جسکو بھی دیکھنا ہو کئی بار دیکھنا
ندا فاطمی
कैफ़ी आज़मी के लिखे बेस्ट 5 फिल्मी गीत
1.
तुम जो मिल गए हो, तो ये लगता है
कि जहां मिल गया
एक भटके हुए राही को, कारवाँ मिल गया
बैठो न दूर हमसे, देखो खफ़ा न हो
क़िस्मत से मिल गए हो, मिलके जुदा न हो
मेरी क्या ख़ता है, होता है ये भी
की ज़मीं से भी कभी आसमां मिल गया
तुम जो मिल गए हो...
तुम क्या जानो तुम क्या हो, एक सुरीला नगमा हो
भीगी रातों में मस्ती, तपते दिल में साया हो
अब जो आ गए हो जाने न दूंगा
की मुझे इक हसीं मेहरबाँ मिल गया
तुम जो मिल गए हो...
तुम भी थे खोए-खोए, मैं भी बुझा-बुझा
था अजनबी ज़माना, अपना कोई न था
दिल को जो मिल गया है तेरा सहारा
इक नई ज़िंदगी का निशां मिल गया
तुम जो मिल गए हो...
2.
मिलो ना तुम तो हम घबराए, मिलो तो आँख चुराए
हमे क्या हो गया है?
तुम ही को दिल का राज बताये, तुम ही से राज छूपाये
हमे क्या हो गया है?
ओ भोले साथिया, देखी जो शौखी तेरे प्यार की
आँचल में भर ली हम ने, सारी बहारे संसार की
नयी अदा से हम इतराए, पायी खुशी लुटाए
हमे क्या हो गया है?
ओ सोहने जोगिया, रंग ले हमे भी किसी रंग में
फिर से सूना दे बंसी, कलियाँ खिला दे गोरे अंग में
वही जो ताने आग लगाए, उन ही से आग बुझाए
हमे क्या हो गया है?
3.
कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई
फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया
कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं
सर हिमालय का हमने न झुकने दिया
मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने के रुत रोज़ आती नहीं
हस्न और इश्क दोनों को रुस्वा करे
वह जवानी जो खूँ में नहाती नहीं
आज धरती बनी है दुलहन साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
राह कुर्बानियों की न वीरान हो
तुम सजाते ही रहना नए काफ़िले
फतह का जश्न इस जश्न के बाद है
ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले
बांध लो अपने सर से कफ़न साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
खींच दो अपने खूँ से ज़मी पर लकीर
इस तरफ आने पाए न रावण कोई
तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे
छू न पाए सीता का दामन कोई
राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो
अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो
4.
ये दुनिया ये महफिल मेरे काम की नहीं
किसको सुनाऊं हाल दिल-ऐ-बेकरार का
बुझता हुआ चराग हूँ अपने मज़ार का
ऐ काश भूल जाऊं मगर भूलता नहीं
किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का
ये दुनिया ये महफिल..
अपना पता मिले ना ख़बर यार की मिले
दुश्मन को भी ना ऐसी सज़ा प्यार की मिले
उनको खुदा मिले हैं खुदा की जिन्हें हैं तलाश
मुझको बस एक झलक मेरे दिलदार की मिले
ये दुनिया ये महफिल..
सेहरा में आके भी मुझको ठिकाना ना मिला
गम को भुलाने का कोई बहाना ना मिला
दिल तरसे जिसमें प्यार को
क्या समझूँ उस संसार को
इक जीती बाज़ी हार के
मैं ढूँढो बिछड़े यार को
ये दुनिया ये महफिल..
दूर निगाहों से आंसूं बहता है कोई
कैसे ना जाऊँ मैं मुझको बुलाता है कोई
या टूटे दिल को जोड़ दो
या सारे बंधन तोड़ दो
ऐ पर्वत रास्ता दे मुझे
ऐ काँटों दामन छोड़ दो
ये दुनिया ये महफिल..
5.
झुकी झुकी सी नज़र बेकरार है के नहीं
दबा दबा सा सही, दिल में प्यार है के नहीं
तू अपने दिल की जवान धडकनों को गिन के बता
मेरी तरह तेरा दिल बेकरार है के नहीं
वो पल के जिस में मोहब्बत जवान होती है
उस एक पल का तुझे इन्तजार है के नहीं
तेरी उम्मीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को
तुझे भी अपने पे ये ऐतबार है के नहीं
हालात के क़दमों पे क़लंदर नहीं गिरता
टूटे भी जो तारा तो ज़मीं पर नहीं गिरता
गिरते हैं समुंदर में बड़े शौक़ से दरिया
लेकिन किसी दरिया में समुंदर नहीं गिरता
समझो वहाँ फलदार शजर कोई नहीं है
वो सहन कि जिस में कोई पत्थर नहीं गिरता
इतना तो हुआ फ़ाएदा बारिश की कमी का
इस शहर में अब कोई फिसलकर नहीं गिरता
इनआ'म के लालच में लिखे मद्ह किसी की
इतना तो कभी कोई सुख़न-वर नहीं गिरता
हैराँ है कई रोज़ से ठहरा हुआ पानी
तालाब में अब क्यूँ कोई कंकर नहीं गिरता
उस बंदा-ए-ख़ुद्दार पे नबियों का है साया
जो भूक में भी लुक़्मा-ए-तर पर नहीं गिरता
करना है जो सर मा'रका-ए-ज़ीस्त तो सुन ले
बे-बाज़ू-ए-हैदर दर-ए-ख़ैबर नहीं गिरता
क़ाएम है 'क़तील' अब ये मिरे सर के सुतूँ पर
भौंचाल भी आए तो मिरा घर नहीं गिरता
© Qateel Shifai ❤
"हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैसे" : अमीर मीनाई
हुए नामवर बे-निशाँ कैसे कैस
े
ज़मीं खा गई आसमाँ कैसे कैसे
तिरी बाँकी चितवन ने चुन चुन के मारे
नुकीले सजीले जवाँ कैसे कैसे
न गुल हैं न ग़ुंचे न बूटे न पत्ते
हुए बाग़ नज़्र-ए-ख़िज़ाँ कैसे कैसे
सितारों की देखो बहार आँख उठा कर
खिलाता है फूल आसमाँ कैसे कैसे
कड़े उन के तेवर जो मक़्तल में देखे
लिए नाज़ ने इम्तिहाँ कैसे कैसे
यहाँ दर्द से हाथ सीने पे रखा
वहाँ उन को गुज़रे गुमाँ कैसे कैसे
वो सूरत न आँखों में अब है न दिल में
मकीं से हैं ख़ाली मकाँ कैसे कैसे
तिरे जाँ-निसारों के तेवर वही हैं
गले पर हैं ख़ंजर रवाँ कैसे कैसे
जहाँ नाम आता है उन का ज़बाँ पर
तो लेती है बोसे ज़बाँ कैसे कैसे
हर इक दिल पे हैं दाग़ नाकामियों के
निशाँ दे गया बे-निशाँ कैसे कैसे
बहार आ के क़ुदरत की गुलशन में देखो
खिलाता है गुल बाग़बाँ कैसे कैसे
उठाए हैं मज्नूँ ने लैला की ख़ातिर
शुतुर-ग़मज़ा-ए-सार-बाँ कैसे कैसे
ख़ुश-इक़बाल क्या सर-ज़मीन-ए-सुख़न है
मिले हैं उसे बाग़बाँ कैसे कैसे
जवानी का सदक़ा ज़रा आँख उठाओ
तड़पते हैं देखो जवाँ कैसे कैसे
शब-ए-वस्ल हल होंगे क्या क्या मुअ'म्मे
अ'याँ होंगे राज़-ए-निहाँ कैसे कैसे
ख़िज़ाँ लूट ही ले गई बाग़ सारा
तड़पते रहे बाग़बाँ कैसे कैसे
बना कर दिखाए मिरे दर्द-ए-दिल ने
तह-ए-आसमाँ आसमाँ कैसे कैसे
'अमीर' अब मदीने को तू भी रवाँ हो
चले जाते हैं कारवाँ कैसे कैसे
- अमीर अहमद (अमीर मीनाई)
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मिलना था इत्तफाक बिछड़ना नसीब था
वो इतना दूर हो गया जीतना करीब था
में उस को देखने के लिए तरसती ही रह गई
जिस सक्स की हथेली में मेरा नसीब था
बस्ती के सारे लोग ही आतिश प्रस्त थे
घर जल रहा था और संमदर करीब थे
मरियम कहा तलाश करें अपने खुन को
हर सक्स के गले में निशाने तलीफ था
दफ़ना दिया गया मुझे चांदी की क़ब्र में
में जिस को चाहतीं थीं वो लड़का गरीब था
❤❤❤❤❤❤❤☝
देर लगी आने में तुम को शुक्र है फिर भी आए तो
आस ने दिल का साथ न छोड़ा वैसे हम घबराए तो
शफ़क़ धनक महताब घटाएँ तारे नग़्मे बिजली फूल
इस दामन में क्या क्या कुछ है दामन हाथ में आए तो
चाहत के बदले में हम तो बेच दें अपनी मर्ज़ी तक
कोई मिले तो दिल का गाहक कोई हमें अपनाए तो
क्यूँ ये मेहर-अंगेज़ तबस्सुम मद्द-ए-नज़र जब कुछ भी नहीं
हाए कोई अंजान अगर इस धोके में आ जाए तो
सुनी-सुनाई बात नहीं ये अपने ऊपर बीती है
फूल निकलते हैं शो'लों से चाहत आग लगाए तो
झूट है सब तारीख़ हमेशा अपने को दोहराती है
अच्छा मेरा ख़्वाब-ए-जवानी थोड़ा सा दोहराए तो
नादानी और मजबूरी में यारो कुछ तो फ़र्क़ करो
इक बे-बस इंसान करे क्या टूट के दिल आ जाए तो
अंदलीब शादानी
Puchh kar mera pata waqt zaya na karo
Main to banjara hun jane kidhar jaunga
कौन चाहेगा तुम्हें मेरी तरह
अब किसी से न मुहब्बत करना
परवीन शाकिर
फूल सर चढ़ा जो चमन से निकल गया
इज़्ज़त उसे मिली जो वतन से निकल गया
अहले जौहर को वतन में रहने देता गर फलक
लाल क्यों फिर हिंद में आता बदख्शां छोड़ कर
اتنا بھی ہم سے ناراض نہ ہوا کر
بدقسمت ضرور ہیں ہم مگر ہے وفا نہیں
ग़ज़ल उसने छेड़ी मुझे साज देना
जेरा उम्र रफ्ता को आवाज़ देना
ठुकरा दो अगर दे कोई जिल्लत से समुंदर
इज़्ज़त से जो मिल जाए वो कतरा ही बहुत है
गुलशन से आ रही है बुए कबाब
किसी बुलबुल का दिल जला होगा
मैंने जो तेरे हिज़्र में देखी तेरी खूबी
वह बात तेरे साथ भी महसूस नहीं की
राहत सरहदी
وہ بھی رہا بیگانہ ہم نے بھی نہ پہچانا
ہاں ا ے دِل دیوانہ ، اپنا ہو تو ایسا ہو
انشا
ذکر کیسا ہی سہی بزم میں بیٹھے ہو معصوم
درد کیسا ہی اٹھے ہاتھ نہ دل پر رکھنا
نہ کر تقدیر سے شکوہ مقدر آزماتا جا
نہ ڈر منزِل کی دوری سے بس قدم آگے بڑھاتا جا
مُدّت کے بعد اُسنے جو آواز دی مُجھے
قدموں کی کیا بساط تھی ،سانسیں بھی رُک گئیں
شاکر پروین
خزاں کی دُھوپ سے شکوہ فضول ہے محسن
میں یوں بھی پُھول تھا آخر مُجھے بکھرنا تھا
तुम सलामत रहो हज़ार बरस
हर बरस के दिन हों पचास हजार
हम पैरवीए क़ैस न फरहाद करेंगे
हम तर्ज़े ज़नूं और ही इज़ाद करेंगे
ہر مکاں کو اپنے مکیں سے شرف ہے اسد
مجنوں جو مر گیا تو جنگل اُداس ہے
करो मेहरबानी तू अहले ज़मीं पर
खुदा मेहरबां होगा अरसे बरीं पर
کروں میں دشمنی کس سے جو دُشمن بهی ہو دوست اپنا
محبّت نے نہ چھوڑی ہے جگہ دِل میں عداوت کی
पाकिस्तान के एक मशहूर शायर सुलेमान हैदर की एक कविता
"सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा" :नज़ीर अकबराबादी
टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे मारा
क़ज़्ज़ाक़ अजल का लूटे है दिन रात बजा कर नक़्क़ारा
क्या बधिया भैंसा बैल शुतुर क्या गौनें पल्ला सर-भारा
क्या गेहूँ चाँवल मोठ मटर क्या आग धुआँ और अँगारा
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
गर तो है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है
ऐ ग़ाफ़िल तुझ से भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी है
क्या शक्कर मिस्री क़ंद गरी क्या सांभर मीठा खारी है
क्या दाख मुनक़्का सोंठ मिरच क्या केसर लौंग सुपारी है
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
तू बधिया लादे बैल भरे जो पूरब पच्छम जावेगा
या सूद बढ़ा कर लावेगा या टूटा घाटा पावेगा
क़ज़्ज़ाक़ अजल का रस्ते में जब भाला मार गिरावेगा
धन दौलत नाती पोता क्या इक कुम्बा काम न आवेगा
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
हर मंज़िल में अब साथ तिरे ये जितना डेरा-डांडा है
ज़र दाम-दिरम का भांडा है बंदूक़ सिपर और खांडा है
जब नायक तन का निकल गया जो मुल्कों मुल्कों हांडा है
फिर हांडा है न भांडा है न हल्वा है न मांडा है
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
जब चलते चलते रस्ते में ये गौन तिरी रह जावेगी
इक बधिया तेरी मिट्टी पर फिर घास न चरने आवेगी
ये खेप जो तू ने लादी है सब हिस्सों में बट जावेगी
धी पूत जँवाई बेटा क्या बंजारन पास न आवेगी
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
ये खेप भरे जो जाता है ये खेप मियाँ मत गिन अपनी
अब कोई घड़ी पल सा'अत में ये खेप बदन की है कफ़नी
क्या थाल कटोरी चाँदी की क्या पीतल की ढिबिया-ढकनी
क्या बर्तन सोने चाँदी के क्या मिट्टी की हंडिया चीनी
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चले गा बंजारा
ये धूम-धड़क्का साथ लिए क्यूँ फिरता है जंगल जंगल
इक तिनका साथ न जावेगा मौक़ूफ़ हुआ जब अन्न और जल
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमल
चलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
कुछ काम न आवेगा तेरे ये लाल-ओ-जमुर्रद सीम-ओ-ज़र
जब पूँजी बाट में बिखरेगी हर आन बनेगी जान ऊपर
नौबत नक़्क़ारे बान निशान दौलत हशमत फ़ौजें लश्कर
क्या मसनद तकिया मुल्क मकाँ क्या चौकी कुर्सी तख़्त छतर
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
क्यूँ जी पर बोझ उठाता है इन गौनों भारी भारी के
जब मौत का डेरा आन पड़ा फिर दूने हैं ब्योपारी के
क्या साज़ जड़ाओ ज़र-ज़ेवर क्या गोटे थान कनारी के
क्या घोड़े ज़ीन सुनहरी के क्या हाथी लाल अमारी के
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
मफ़रूर न हो तलवारों पर मत फूल भरोसे ढालों के
सब पट्टा तोड़ के भागेंगे मुँह देख अजल के भालों के
क्या डब्बे मोती हीरों के क्या ढेर ख़ज़ाने मालों के
क्या बुग़चे ताश मोशज्जर के क्या तख़्ते शाल दोशालों के
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
क्या सख़्त मकाँ बनवाता है ख़म तेरे तन का है पोला
तू ऊँचे कोट उठाता है वाँ गोर गढ़े ने मुँह खोला
क्या रेनी ख़ंदक़ रन्द बड़े क्या ब्रिज कंगूरा अनमोला
गढ़ कोट रहकला तोप क़िला क्या शीशा दारू और गोला
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
हर आन नफ़अ' और टोटे में क्यूँ मरता फिरता है बन बन
टक ग़ाफ़िल दिल में सोच ज़रा है साथ लगा तेरे दुश्मन
क्या लौंडी बांदी दाई दवा क्या बंदा चेला नेक-चलन
क्या मंदर मस्जिद ताल कुआँ क्या खेती बाड़ी फूल चमन
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
जब मर्ग फिरा कर चाबुक को ये बैल बदन का हाँकेगा
कोई नाज समेटेगा तेरा कोई गौन सिए और टाँकेगा
हो ढेर अकेला जंगल में तू ख़ाक लहद की फाँकेगा
उस जंगल में फिर आह 'नज़ीर' इक तिनका आन न झाँकेगा
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
- वली मुहम्मद (नज़ीर अकबराबादी)
........................................
ग़म का नहीं है कोई खरीदार जहां में
खुशियों का जहां में कोई बाजार नहीं है
हर शख्स को है स्वर्ग में जाने की तमन्ना
मारने को मगर कोई भी तैयार नहीं है
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
बा-हज़ाराँ इज़्तिराब ओ सद-हज़ाराँ इश्तियाक़
तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है
बार बार उठना उसी जानिब निगाह-ए-शौक़ का
और तिरा ग़ुर्फ़े से वो आँखें लड़ाना याद है
तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा
और तिरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है
खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ'तन
और दुपट्टे से तिरा वो मुँह छुपाना याद है
जान कर सोता तुझे वो क़स्द-ए-पा-बोसी मिरा
और तिरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है
तुझ को जब तन्हा कभी पाना तो अज़-राह-ए-लिहाज़
हाल-ए-दिल बातों ही बातों में जताना याद है
जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो कुछ तुम को भी वो कार-ख़ाना याद है
ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है
दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है
आज तक नज़रों में है वो सोहबत-ए-राज़-ओ-नियाज़
अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है
मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की
ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है
देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा
>
और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है
बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा 'हसरत' मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है
हसरत मोहानी
"जितनी भारी गठरी होगी" : गोपाल दास नीरज
जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा
जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा
उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा
हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा
जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा
‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा
– गोपाल दास नीरज
#GopalDasNeeraj#
अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं..!!
जां निसार अख़्तर
बशीर बद्र के टॉप 20 शेर
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला
यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
कभी कभी तो छलक पड़ती हैं यूँही आँखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे
इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं
अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा
जी बहुत चाहता है सच बोलें
क्या करें हौसला नहीं होता
आशिक़ी में बहुत ज़रूरी है
बेवफ़ाई कभी कभी करना
उस की आँखों को ग़ौर से देखो
मंदिरों में चराग़ जलते हैं
मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए
कभी सोने कभी चाँदी के क़लम आते हैं
वो आएगा नुमाइश ए सामान देखकर
क्यों कारोबार छोड़ दूं नुक़सान देखकर
नख़रे उठा रही हूं तुम्हारी तलाश के
रुकती नहीं हूं रास्ता वीरान देखकर
सोचा नहीं था मैंने कभी तेरे जैसा शख़्स
मुंह फेर लेगा मुझको परेशान देखकर
वो तेरा लम्स वो तिरि बाहों की ख़ुशबुएं
लौटी हूं जैसे कोई गुलिस्तान देखकर
तू लाख बेवफ़ा है मगर सर उठा के चल
दिल रो पड़ेगा तुझको पशेमान देखकर
ज़ाहिर न हो कि मुझसे तेरा वास्ता भी है
सबकी नज़र है तुझपे मेरी जान देखकर
हिमांशी बाबरा
किसी का इश्क़ किसी का ख़याल थे हम भी
गए दिनों में बहुत बाकमाल थे हम भी
हमारी खोज में रहती थीं तितलियां अक्सर
कि अपने शहर का हुस्नो जमाल थे हम भी
ज़मीं की गोद में सर रख के सो गए आख़िर
तुम्हारे इश्क़ में कितने निढाल थे हम भी
ज़रूरतों ने हमारा ज़मीर चाट लिया
वगरना क़ायल ए रिज़्क़ ए हलाल थे हम भी
हम अक्स अक्स बिखरते रहे इसी धुन में
कि ज़िंदगी में कभी लाजवाल थे हम भी
परवीन शाकिर
मिलेंगे अगले जनम में ये आस भी न रहे
जो खुश्क हो गए दरिया तो प्यास भी न रहे
जो कह रहे थे कि जीना मुहाल है तुम बिन
बिछड़ के मुझ से वो दो दिन उदास भी न रहे
मुझे ये फ़िक्र कि मैं आबरू बचा ले जाऊं
हवा को ज़िद कि बदन पर लिबास भी न रहे
नया-निज़ाम , नया बाग़ और नया माली
मगर ये क्या कि फलों में मिठास भी न रहे
मेराज फ़ैज़ाबादी
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میں نہ جُگنو ہُوں دِیا ہُوں نہ کوئی تارا ہُوں
روشنی والے میرے نام سے جلتے کیوں ہیں
बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है
बहुत जी चाहता है क़ैद-ए-जाँ से हम निकल जाएँ
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है
यह ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता
मैं जब तक घर न लौटूँ मेरी माँ सजदे में रहती है
अमीरी रेशम-ओ-कमख़्वाब में नंगी नज़र आई
ग़रीबी शान से इक टाट के पर्दे में रहती है
मैं इन्साँ हूँ बहक जाना मेरी फ़ितरत में शामिल है
हवा भी उसको छू कर देर तक नशे में रहती है
मुहब्बत में परखने जाँचने से फ़ायदा क्या है
कमी थोड़ी-बहुत हर एक के शजरे में रहती है
ये अपने आप को तक़्सीम कर लेता है सूबों में
ख़राबी बस यही हर मुल्क के नक़्शे में रहती है
मुनव्वर राना
ان رس بھری آنکھوں میں حیا کھیل رہی ہے
دو زہر کے پیالوں پہ قضا کھیل رہی ہے
ہیں نرگس و گل کس لیے مسحور تماشا
گلشن میں کوئی شوخ ادا کھیل رہی ہے
اس بزم میں جائیں تو یہ کہتی ہیں ادائیں
کیوں آئے ہو کیا سر پہ قضا کھیل رہی ہے
اس چشم سیہ مست پہ گیسو ہیں پریشاں
میخانے پہ گھنگھور گھٹا کھیل رہی ہے
بد مستی میں تم نے انہیں کیا کہہ دیا اختر
کیوں شوخ نگاہوں میں حیا کھیل رہی ہے
اختر شیرانی
झूठी बुलंदियों का धुँआ पार कर के आ
क़द नापना है मेरा तो छत से उतर के आ
इस पार मुंतज़िर हैं तेरी खुश-नसीबियाँ
लेकिन ये शर्त है कि नदी पार कर के आ
कुछ दूर मैं भी दोशे-हवा पर सफ़र करूँ
कुछ दूर तू भी ख़ाक की सूरत बिखर के आ
मैं धूल में अटा हूँ मगर तुझको क्या हुआ
आईना देख जा ज़रा घर जा सँवर के आ
सोने का रथ फ़क़ीर के घर तक न आयेगा
कुछ माँगना है हमसे तो पैदल उतर के आ
राहत इंदौरी
महफ़िल में तेरी आके यूँ बे-आबरू हुए
पहले थे आप, आप से तुम, तुम से तू हुए
© Nooh Narvi ❤
कैफ़ी आज़मी के 20 मशहूर शेर
1.जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िन्दगी का रहा
2.इन्साँ की ख़्वाहिशों की कोई इन्तिहा नहीं
दो गज़ ज़मीं भी चाहिए, दो गज़ कफ़न के बाद
3.मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई
4.पाया भी उनको खो भी दिया चुप भी हो रहे
इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं
5.जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यों
मुझे ख़ुद अपने क़दम का निशाँ नहीं मिलता
6.आज फिर टूटेंगी तेरे घर नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में
7.ख़ार-ओ-ख़स तो उठें, रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया, क़ाफ़िला तो चले
8.दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं
याद इतना भी कोई न आए
9.जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
10.तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता
मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं
11.गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ
12.दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार
कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं
13.मैं ढूँढ़ता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता
14.नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता
15.पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा
16.बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने
17.तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो
18.जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो
19.दीवाना-वार चाँद से आगे निकल गए
ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बाद
2.ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप
क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बाद
بھیگی ہوئی آنکھوں کا یہ منظر نہ ملےگا
گھر چھوڑ کر نہ جاؤ کہیں گھر نہ ملےگا
بشیر بدر
Ghar chhod ke n Jao kahin ghar n milega
ہم سے بدل گیا وہ نگاہیں تو کیا ہوا
زندہ ہیں کتنے لوگ محبت کئے بغیر
گزرے دنوں میں جو کبھی گونجے تھے قہقہے
اب اپنے اختیار میں وہ بھی نہیں رہے
قسمت میں رہ گئی ہیں جو آہیں تو کیا ہوا
صدمہ یہ جھیلنا ہے شکایت کئے بغیر
وہ سامنے بھی ہوں تو نہ کھولیں گے ہم زباں
لکھی ہے اس کے چہرے پہ اپنی ہی داستاں
اس کو ترس گئی ہیں یہ باہیں تو کیا ہوا
وہ لوٹ جائے ہم پہ عنایت کئے بغیر
پہلے قریب تھا کوئی اب دوریاں بھی ہیں
انسان کے نصیب میں مجبوریاں بھی ہیں
اپنی بدل چکا ہے وہ راہیں تو کیا ہوا
ہم چپ رہیں گے اس کو ملامت کئے بغیر
قتیل شفائی
नज़ीर बनारसी के 10 लाजवाब शेर
1.रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ इस मंज़िल में लाया है मुझे
दर्द उठता है किसी को और तड़प जाता हूं मैं
2.अंधेरा मांगने आया था रौशनी की भीक
हम अपना घर न जलाते तो और क्या करते
3.बद-गुमानी को बढ़ाकर तुमने ये क्या कर दिया
ख़ुद भी तन्हा हो गए मुझको भी तन्हा कर दिया
4.और तो कुछ न हुआ पी के बहक जाने से
बात मयख़ाने की बाहर गई मयख़ाने से
5.एक दीवाने को जो आए हैं समझाने कई
पहले मैं दीवाना था और अब हैं दीवाने कई
6.वो आइना हूं जो कभी कमरे में सजा था
अब गिर के जो टूटा हूं तो रस्ते में पड़ा हूं
7.है ज़िंदादिली दौलत सब ख़र्च न कर देना
शायद कभी काम आए थोड़ी सी बचा रखना
8.हर ख़ता को नजर अन्दाज किये जाओ ’नजीर’
जान दे दो मगर अपनों के सर इल्जाम न दो
9.दुनिया है इक पड़ाव मुसाफिर के वास्ते
इक रात सांस ले के चलेंगे यहां से हम
10.इसको तो चाहिए इक उम्र संवरने के लिए
जिन्दगी है तेरा उलझा हुआ गेसू तो नहीं है
मुनव्वर राना के लिखे वो 20 शेर जो ज़ुबान पर चढ़ गए
1.इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए
आपको चेहरे से भी बीमार होना चाहिए
2.ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें
टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए
3.बरसों से इस मकान में रहते हैं चंद लोग
इक दूसरे के साथ वफ़ा के बग़ैर भी
4.एक क़िस्से की तरह वो तो मुझे भूल गया
इक कहानी की तरह वो है मगर याद मुझे
5.भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है
मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है
6.ताज़ा ग़ज़ल ज़रूरी है महफ़िल के वास्ते
सुनता नहीं है कोई दोबारा सुनी हुई
7.हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं
8.अँधेरे और उजाले की कहानी सिर्फ़ इतनी है
जहाँ महबूब रहता है वहीं महताब रहता है
9.कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा
तुम्हारे बाद किसी की तरफ़ नहीं देखा
10.किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
11.मैं इस से पहले कि बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ
मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ
12.मसर्रतों के ख़ज़ाने ही कम निकलते हैं
किसी भी सीने को खोलो तो ग़म निकलते हैं
13.मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता
अब इस से ज़यादा मैं तेरा हो नहीं सकता
14.मुख़्तसर होते हुए भी ज़िंदगी बढ़ जाएगी
माँ की आँखें चूम लीजे रौशनी बढ़ जाएगी
15.वो बिछड़ कर भी कहाँ मुझ से जुदा होता है
रेत पर ओस से इक नाम लिखा होता है
16.मैं भुलाना भी नहीं चाहता इस को लेकिन
मुस्तक़िल ज़ख़्म का रहना भी बुरा होता है
17.तेरे एहसास की ईंटें लगी हैं इस इमारत में
हमारा घर तेरे घर से कभी ऊँचा नहीं होगा
18.ये हिज्र का रस्ता है ढलानें नहीं होतीं
सहरा में चराग़ों की दुकानें नहीं होतीं
19.ये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गया
मैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया
20.उस पेड़ से किसी को शिकायत न थी मगर
ये पेड़ सिर्फ़ बीच में आने से कट गया